Related Posts with Thumbnails
Flipkart.com

द ग्रेट स‌र्कस ऑफ न्यूजरूम 16

रविवार, 21 नवम्बर 2010

सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ेंएक दो तीन चार पांच छहसात आठ नौ दस‌ ग्यारह बारह तेरह चौदह

स‌र्कस में कौवे और उल्लू भी हैं। लेकिन चितकबरे कबूतर के तो कहने ही क्या। वह पूरे स‌र्कस में एक ही है। इकलौता। अनोखा। अनजाना। चितकबरापन भी उसे कुदरत स‌े नहीं मिला। उसने खुद हासिल किया है। अपनी काबिलियत के बलबूते। शायद कभी वो दूसरे कबूतर-कबूतरियों की तरह स‌ाफ-सुथरा हुआ करता था। स‌फेद, चमकदार और चिकना। वक्त के स‌ाथ-साथ उसका रंग बदलता गया। पहले वह स्याह हुआ। फिर काला। और फिर शरीर में जगह-जगह चित्तियां पड़ने लगीं। इस तरह वह चितकबरा कबूतर बन गया। बाकी कबूतरों और कबूतरियों स‌े अलग। स‌बस‌े जुदा।

अलग के स‌ाथ-साथ खास नजर आना भी जरूरी है। लिहाजा चीफ ने उसे खास बना दिया। चीफ का खास वो पहले स‌े था। अब कबूतर-कबूतरियों में भी खास बन गया। देखने में भारी-भरकम और चित्तीदार। दूसरे स‌र्कस के कबूतर-कबूतरियों को तो कई बार धोखा हो जाता है। वह उसे कोई और जानवर स‌मझ बैठते हैं। उन्हें लगता कि ये तो हमारे बीच का नहीं है। किसी और प्रजाति का है। मोटा। बेडौल। बेढंगा। लेकिन गौर स‌े देखने पर पता चलता कि वह भी कबूतर ही है। बदला हुआ कबूतर। उस‌के शरीर में मौजूद चित्तियां उसके 'अलग' व्यक्तित्व का एहसास कराती हैं। चीफ का खास होने के हुनर ने उसे स‌र्कस में भी खास बना दिया है। 

कहते हैं कभी वह भी 'उड़ा' करता था। अब उड़ भी नहीं पाता। स‌िर्फ पंख फड़फड़ाता है। चोंच चलाता है। फिर भी खास है। दूसरे कबूतर-कबूतरियां वाकई में उड़ते हैं। जगह-जगह घूमते हैं। फिरते हैं। धक्के खाते हैं। तब कहीं जाकर स‌र्कस के शो के लिए कुछ माल इकट्ठा हो पाता है। लेकिन चितकबरा कबूतर बिना उड़े ही माल इकट्ठा कर लेता है। कभी उड़ने का दिखावा करके। कभी दूसरे कबूतर-कबूतरियों की मेहनत पर डाका डालकर। उनके काम को अपना बताकर। हड़पकर। वह स‌ीना ठोककर ऎसा करता है। चीफ ने उसे ऎसा करने का हक दिया है। शायद। वो कबूतर-कबूतरियों का चीफ है। चीफ के मुताबिक। इसलिए वह स‌िर्फ रौब जमाता है। चीफ की तरह। ऑर्डर झाड़ता है। हर वक्त। बेवक्त। 

चितकबरा कबूतर कुछ और कर भी नहीं स‌कता। किसी शो के लिए जरूरी स‌ामान नहीं जुटा स‌कता। स‌र्कस स‌े बाहर निकलता है तो उसे कोई जानता नहीं। पहचानता ही नहीं। खुद अपना परिचय देता है तो दूसरे स‌र्कस के कबूतर-कबूतरियां उसका मजाक बनाते हैं। उसके बेडौल शरीर को लेकर टिप्पणियां करते हैं। हंसते हैं। ठहाके लगाते हैं। कोई उसे गिद्ध कहकर चिड़ाता है। कोई उल्लू बताता है। कोई उसके जंगल स‌े स‌र्कस तक पहुंचने की कहानियां स‌ुनाता है। उस‌की असलियत को बेपर्दा करने की हिमाकत करता है। लेकिन कलाकार तो वह फिर भी रहता है। वरिष्ठ कलाकार। सुपर स‌ीनियर कबूतर। दूसरे कबूतर-कबूतरियां उसे स‌ंक्षिप्त में 'स‌ीके' कहते हैं। कुछ स‌िर्फ 'स‌ी' कहकर भी काम चला लेते हैं। 

छोटे कबूतर-कबूतरियां दिन भर मेहनत करते हैं। कमाते हैं। वह खाता है। मुफ्त का माल उड़ाता है। तभी उसका शरीर बेडौल, बेढंगा और अजीब हो गया है। वह उसे स‌ही आकार देने की लाख कोशिश करता है। मगर फिर भी किसी भी दृष्टि स‌े कबूतर नजर नहीं आता। बाज औऱ चील का नजदीकी रिश्तेदार लगता है। उनकी प्रजाति का प्रतीत होता है। उसके शरीर पर मौजूद चित्तियां भी स‌बको ऎसा स‌ोचने पर मजबूर कर देती हैं। उसका ये चितकबरापन शायद चीफ को बहुत पसंद है। तभी तो वह उसे हर वक्त अपने स‌ाथ लेकर घूमता है। हर बात में उसका बचाव करता है। पक्ष लेता है। हुनरमंद बताता है। हकीकत छिपाता है। 

दूसरे कबूतर-कबूतरियां स‌र्कस छोड़कर चले जाएं ये चीफ को मंजूर है। लेकिन चितकबरे कबूतर को कुछ नहीं होना चाहिए। उसे कहीं नहीं जाना चाहिए। वह लाखों में एक है। चीफ की नजर में। हीरा है। स‌दा के लिए। लेकिन बाकी स‌बकी नजरों में वो स‌िर्फ पत्थर है। काला पत्थर। यह स‌ब जानते हैं। स‌ब मानते हैं। चीफ भी जानता है। लेकिन मानता नहीं। चितकबरा प्रेम उसे सच को झुठलाने पर विवश कर देता है। पता नहीं चीफ को उसकी कौन स‌ी 'प्रतिभा' प्रभावित करती है। यह एक राज है। स‌र्कस में स‌ब इसी स‌वाल का जवाब ढूंढ रहे हैं। खासकर वो कबूतर और कबूतरियां जो चितकबरे की हरकतों स‌े परेशान हैं। आजिज हैं। चितकबरे कबूतर को उनके स‌िर पर लाकर बैठा दिया गया है। ढोने के लिए। 

कई कबूतर-कबूतरियां तो चितकबरे स‌े परेशान होकर भाग खड़े हुए। स‌र्कस को छोड़कर। स‌दा के लिए मुहं मोड़कर। लेकिन चीफ को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह दूसरे स‌र्कस स‌े नए कबूतर-कबूतरियां ले आता है। यूं तो स‌र्कस की दुनिया में कबूतर-कबूतरी बहुत मिलते हैं। नए- पुराने। जाने-अनजाने। महंगे-सस्ते। लेकिन चितकबरा कबूतर आसानी स‌े नहीं मिलता। उसकी खासियतें चीफ को प्रभावित करती हैं। लेकिन वो 'खासियतें' क्या हैं? ये कोई अब तक नहीं जान पाया। जो जान गया उसे स‌र्कस स‌े चलता कर दिया गया। या फिर खामोश रहने की ताकीद कर दी गई। 

इस तरह चितकबरे कबूतर का राज अब तक राज ही बना हुआ है। स‌र्कस में ऎसा ही होता है। जो ठीक स‌े उड़ तक नहीं पाता उसे कबूतर-कबूतरियों का चीफ बना दिया जाता है। जो ठीक स‌े व्यक्त नहीं कर पाता वो स‌ूत्रधार बन जाता है। अचानक। कभी भी। रातोंरात। यही हकीकत है। यही सर्कस है। (जारी...)

सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ेंएक दो तीन चार पांच छहसात आठ नौ दस‌ ग्यारह बारह तेरह चौदह

7 comments:

स‌बसे तेज ने कहा…

भाई चितकबरा कबूतर तो आजकल कहीं और बिजी है :)

MAYA ने कहा…

मानव जीवन की भी शायद यहि कहानी है...सुन्दर रचना.....

अमीत तोमर ने कहा…

दोस्तों क्या आप जानते हें 4 जून को डेल्ही में बाबा रामदेव इस भ्रस्ताचार के खिलाफ एक आन्दोलन करने जारहे हे अधिक जानने के लिए ये लिंक देखें
http://www.bharatyogi.net/2011/04/4-2011.html

प्रवेश गौरी 'नमन' ने कहा…

आपके सफल ब्लॉग के लिए साधुवाद!
हिंदी भाषा-विद एवं साहित्य-साधकों का ब्लॉग में स्वागत है.....
कृपया अपनी राय दर्ज कीजिए.....
टिपण्णी/सदस्यता के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें....
http://pgnaman.blogspot.कॉम
हरियाणवी बोली के साहित्य-साधक अपनी टिपण्णी/सदस्यता के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें....
http://haryanaaurharyanavi.blogspot.com

प्रवेश गौरी 'नमन' ने कहा…

आपके सफल ब्लॉग के लिए साधुवाद!
हिंदी भाषा-विद एवं साहित्य-साधकों का ब्लॉग में स्वागत है.....
कृपया अपनी राय दर्ज कीजिए.....
टिपण्णी/सदस्यता के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें....
http://pgnaman.blogspot.कॉम
हरियाणवी बोली के साहित्य-साधक अपनी टिपण्णी/सदस्यता के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें....
http://haryanaaurharyanavi.blogspot.com

Surendra shukla" Bhramar"5 ने कहा…

बहुत सुन्दर .मानव जीवन से मेल जोल खाती ......सार्थक आनंद दाई ......

भ्रमर ५
प्रतापगढ़

Sheelnidhi ने कहा…

सुन्दर रचना...

www.sheelgupta.blogspot.com

  © Blogger templates Newspaper by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP