द ग्रेट सर्कस आफ न्यूजरूम 15
शनिवार, 6 नवम्बर 2010
कबूतरी फिर अपने पुराने सर्कस में लौट आई है। पहले से बहुत बदल गई है। बरसों पहले वह इसी सर्कस का हिस्सा होती थी। चीफ रिंग मास्टर की नजर में वह काफी हुनरमंद है। आज भी और कल भी। इसीलिए चीफ ने उसे पहले ही सर्कस का सूत्रधार बना दिया था। तब से ही सर्कस में उसे चीफ का काफी करीबी माना जाता है। बहुत चालक है ये कबूतरी। इधर का उधर करने के मामले में तो जोकर से कम नहीं है। अपने फायदे के लिए 'कुछ भी' कर सकती है। करती भी है। इस कबूतरी ने सर्कस में बड़ी तेजी से कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ी हैं। कल तक सर्कस की मामूली सी कलाकार थी। आज स्टार है। सूत्रधार है।
कबूतरी दोबारा इस सर्कस में आई है। लिहाजा रूतबा कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। पुराने दिन शायद भूल गई होगी। बुरे दिनों को भला याद भी कौन रखना चहता है? वो भी क्या दिन थे। तब कबूतरी सर्कस में नई-नई आई थी। सर्कस भी नया था। कबूतरी को खूब डांट खानी पड़ती थी। चीफ की खास होने के बावजूद। कभी उस पर सीनियर रिंग मास्टर चीखता था। कभी हेड रिंग मास्टर। गाहे-बगाहे चूहे भी आंख दिखा देते थे। चीफ बेचारा चुपचाप देखता रहता था। बर्दाश्त करता रहता था। चीफ को बहुत बुरा लगता था। कबूतरी का डांट खाना नागवार गुजरता था।
कबूतरी पूरे तीन साल बाद लौटी है। इस दौरान कहां रही? क्या-क्या किया? कौन-कौन सा हुनर दिखाया? कोई नहीं जानता। जानता है तो सिर्फ चीफ रिंग मास्टर। वही तो उसे दोबारा सर्कस में लेकर आया है। स्टार सूत्रधार बनाकर। सुनते हैं बीच में कबूतरी ने एक और सर्कस ज्वाइन किया था। लेकिन वहां उसकी 'चल' नहीं पाई। मजबूरन सब कुछ छोड़कर घर बैठ गई। तीन साल बाद फिर उसकी प्रतिभा ने जोर मारा। जब अंदर घुसी उसकी प्रतिभा बाहर निकलने को ज्यादा ही बेताब हो गई, तो वह लौट आई। अपने पुराने सर्कस में। वैसे यहां के रास्ते उसके लिए हमेशा से खुले थे। चीफ का प्रिय और खास होने का यही फायदा है।
कबूतरी वापस लौटी तो सर्कस में उसकी पुरानी सहेली लोमड़ी ने उसका जोरदार स्वागत किया। हालांकि लोमड़ी का चेहरा कुछ और ही कह रहा था। हाव-भाव बता रहे थे कि वह खुश नहीं है। बातों-बातों में लोमड़ी ने जता भी दिया। यही कि अब वह सर्कस की सीनियर लोमड़ी हो गई है। लोमड़ी ने मन ही मन सोचा। तीन साल घर बैठने से कबूतरी पीछे रह गई है। अब सूत्रधार बनकर आई है तो क्या हो गया? सर्कस में सिक्का तो लोमड़ी का ही चलेगा। हाथी से लेकर गैंड़े तक उसकी जान-पहचान जो है। देखते हैं कबूतरी कब तक टिकती है। लोमड़ी ने मुस्कराते हुए कबूतरी की तरफ देखा और बिजी होने का दिखावा करती हुई रिंग की तरफ बढ़ गई।
कबूतरी और लोमड़ी में एक समानता है। दोनों खुद को चीफ रिंग मास्टर का बेहद करीबी समझती हैं। सर्कस से लेकर घर तक। उनके चीफ से घरेलू ताल्लुकात हैं। अक्सर परिवार समेत आना-जाना लगा रहता है। कबूतरी ने दोबारा सर्कस में आकर अपने संबंधों को साबित भी कर दिया। अब बारी है लोमड़ी की।
असल में लोमड़ी ईर्ष्या की शिकार है। उसे पता है। कबूतरी उससे ज्यादा खूबसूरत है। स्मार्ट है। वाचाल है। खूबसूरती के बल पर वह जल्द ही सर्कस में राज करने लगेगी। यही डर लोमड़ी को परेशान कर रहा है। इसीलिए लोमड़ी कल से खूब फेयर एंड लवली लगाने लगी है। मेकअप करने लगी है। दोबारा अजीब-अजीब से कपड़े भी पहनने लगी है। ताकि सर्कस में सब लोग उसे ही निहारें। स्वीकारें। और कबूतरी का आकर्षण कुछ कम पड़ जाए।
दो पुरानी सहेलियों के बीच ऎसी जलन, ऎसी ईर्ष्या होना लाजिमी है। कंपटीशन का जमाना है। लेकिन लोमड़ी कितना भी मेकअप करे कितनी भी फेयर एंड लवली लगाए, कबूतरी जैसी नहीं निखर सकती। लोमड़ी का थूथन सारा काम बिगाड़ देता है। उसकी खूबसूरत के रास्ते पर ब्रेकर बन कर खड़ा हो जाता है। लोमड़ी मन मसोस कर रह जाती है। कभी भगवान से शिकायत करती है। कभी अपनी किस्मत को कोसती है। फिर भी हार नहीं मानती। लोमड़ी को कौन समझाए? वह जानकर भी नहीं मानती कि कबूतरी की बात ही कुछ और है। सर्कस में ऎसा सब कहते हैं। चीफ रिंग मास्टर भी ऎसा ही कहता है। और चीफ ने कह दिया तो यही सच है। यही सर्कस है। (जारी...)




2 comments:
आपने लिखा भटकता हूं अक्स विषय की तलाश में, अरे साहब आप जो लिख रहे हैं, उससे बेहतर विषय और क्या हो सकता है।
असित नाथ तिवारी
www.chauthinazar.blogspot.com
nice
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