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शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

द ग्रेट स‌र्कस ऑफ न्यूजरूम 13

सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ेंएक दो तीन चार पांच छहसात आठ नौ दस‌ ग्यारह बारह
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स‌र्कस कभी एक जैसा नहीं रहता। बदलता रहता है। नए-नए कलेवर में ढलता रहता है। अनवरत। इस बदलाव का असर स‌र्कस के कलाकारों पर भी नजर आता है। ऊपर स‌े लेकर नीचे तक। चीफ रिंग मास्टर स‌े लेकर चूहों और बिल्लियों तक।

बदलाव का असर जब चीफ रिंग मास्टर पर पड़ता है तो स‌ब कुछ बदल जाता है। कलाकारों की भूमिकाएं बदल जाती हैं। चेहरे बदल जाते हैं। शो बदल जाते हैं। स‌ूत्रधार बदल जाते हैं। रिंग मास्टर बदल जाते हैं। स‌र्कस बदल जाता है। इस बड़े बदलाव स‌े चीफ भी हैरत में पड़ जाता है। निरीह और बेचारे कलाकारों पर हंटर फटकारने वाले चीफ पर जब चाबुक पड़ता है तो वह तिलमिला उठता है। लेकिन उसकी मजबूरी है। वह अपना दर्द किसी स‌े बयां नहीं कर स‌कता। ऎसे वक्त में कोई उसके पास होता भी नहीं। जो उसकी स‌ुने। उस‌के दर्द को अपना दर्द स‌मझे। चीफ को स‌ब कुछ खामोशी स‌े स‌हना पड़ता है। इस इंतजार में कि फिर उसका वक्त लौटकर आएगा। तब वह स‌बसे गिन-गिनकर बदला लेगा। स‌बको स‌बक स‌िखाएगा।

चीफ एक दिन चला जाता है। सर्कस को छोड़कर। स‌बसे मुंह मोड़कर। अचानक। बिना कुछ बताए। बिना कोई स‌फाई दिए। स‌र्कस में खामोशी छा जाती है। कल तक स‌र्कस में उछल-कूद मचाने वाले कई कलाकार भी अचानक गायब हो जाते हैं। ये वो कलाकार होते हैं जिन्हें स‌र्कस में चीफ का चमचा कहा जाता है। इन चमचों स‌े घिरे रहना चीफ को बहुत पस‌ंद है। ये चमचे हर बात में चीफ की तारीफ के पुल बांधते हैं। हां पर हां मिलाते हैं। उसकी हर अदा को कातिल करार देते हैं। हर अंदाज को गालिब के शेर स‌े जोड़ देते हैं। जब कभी चीफ खुद स‌ूत्रधार बनकर शो में उतरता है तो चमचे उसकी तारीफ में जमीन-आसमान एक कर देते हैं। इससे चीफ खुश होता है। चमचे चीफ की कमजोरी का फायदा उठाते हैं। चीफ को अपनी तारीफ बहुत पसंद है। झूठी हो या स‌च्ची। कोई फर्क नहीं पड़ता। शायद इसीलिए चीफ अपनी तारीफ करने वालों को बहुत पसंद करता है। इस चापलूसी के बदले में गाहे-बगाहे वह अपने चमचों को इनाम भी देता है। स‌भी किसी चमचे को स‌र्कस का स‌र्वश्रेष्ठ कलाकार घोषित कर देता है तो कभी अंदर ही अंदर उनके मेहनताने में इजाफा करवा देता है। इससे चीफ के चमचे खुश रहते हैं। अगले दिन स‌े वह ज्यादा तेज स‌ुर में उस‌की प्रशंसा का गान शुरू कर देते हैं।

चमचे चीफ को अपने बारे में गलतफहमी पालने का पूरा मौका देते हैं। वो उसके दिलो-दिमाग में बैठा देते हैं। सब कुछ वही है। वह जो करेगा स‌ही है। इससे चीफ को लगने लगता है कि वह स‌ब कुछ कर स‌कता है। बेरोकटोक। बेधड़क। नतीजा ये होता है कि वो तानाशाह की तरह व्यवहार करने लगता है। बिल्कुल अहम् ब्रम्हास्मि की तरह। वह बाकी कलाकारों को कीड़े-मकोड़े स‌मझने लगता है। उनकी किस्मत लिखने का दावा करने लगता है। खुद को भगवान मान बैठता है। उसकी बातों में गुरूर बढ़ जाता है। वह अपने स‌ाथी कलाकारों का अपमान करने स‌े भी नहीं चूकता। कल तक वह जिनके स‌ाथ काम करता था अब खुद को उनसे ऊपर स‌मझने लगता है। पूरे न्यूज रूम में घूम-घूम कर अपनी तरक्की का बखान करने लगता है। छोटे कलाकारों को बताता है। देखो मैं कहां स‌े कहां पहुंच गया। बड़े कलाकारों को जताता है। देखो तुम वहीं पड़े हो। मैं चीफ बन गया।

कभी चीफ के स‌ुख-दुख के स‌ाथी रहे कलाकारों को उसके इस व्यवहार स‌े दुख पहुंचता है। लेकिन वो कुछ नहीं बोलते। खामोशी स‌े स‌ुनते रहते हैं। बर्दाश्त करते रहते हैं। कई तो स‌र्कस छोड़कर ही चले जाते हैं। चीफ को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन स‌र्कस पर इसका असर जरूर पड़ता है। यही हकीकत है। यही स‌र्कस है। (जारी...)



सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ेंएक दो तीन चार पांच छहसात आठ नौ दस‌ ग्यारह बारह


1 comments:

कुमार राहुल ने कहा…

चीफ पढ़ लेगा तो आपकी खैर नहीं, BTW लिखा बहुत स‌ही है। स‌ब कुछ आईने की तरह स‌ाफ है।

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