द ग्रेट सर्कस ऑफ न्यूजरूम 12
मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010
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बहुत गहमागहमी है। सर्कस के स्मार्ट कलाकार इधर से उधर भाग रहे हैं। हमेशा की तरह। बेवजह। बीच-बीच में वह चीखने-चिल्लाने भी लगते हैं। ताकि सर्कस में गति बनी रहे। एक चिल्लता है तो दूसरा उससे होड़ करता नजर आता है। सियार हुआं-हुआं करता है तो गधे जोर-जोर से ढेंचू-ढेचूं करने लगते हैं। भालू उछल-कूद मचाने लगते हैं। गोया वही सबसे बड़े खिलाड़ी हों। बंदर, बिल्ली, चूहा सब दौड़-भाग रहे हैं। सियार हमेशा की तरह बिजी है। बिजी दिखना बहुत जरूरी है। सर्कस का एक ही फलसफा है काम करो या न करो। काम करने का दिखावा जरूर करो। यही सर्कस में कामयाबी का मूलमंत्र है। लिहाजा सर्कस के सभी कलाकर इस मंत्र को पूरी शिद्दत से जपते रहते हैं। हर वक्त।
वैसे भी, यह जरूरी नहीं कि सर्कस में सभी कलाकार हुनर दिखाएं। शो करें। नियमित तौर पर कला का प्रदर्शन करें। खेल दिखाएं। कुछ ऎसे कलाकार भी होते हैं जो कला का प्रदर्शन करना अपनी तौहीन समझते हैं। अगर कभी वक्त-जरूरत पर उन्हें कह दिया जाए कि अमुक शो की तैयारी करनी है तो उनका अपमान हो जाता है। ऎसे कलाकार मानकर चलते हैं कि उनका जन्म रिंग में हुनर दिखाने के लिए नहीं हुआ। वह सिर्फ 'वाच' करते हैं। मीटिंग करते हैं। प्लान बनाते हैं। नए-नए शो ईजाद करने की बात करते हैं। सर्कस को हिट बनाने की बात करते हैं। यह भी एक हुनर है। ऎसे हुनरमंद फनकार सर्कस में बहुतायत से पाए जाते हैं।
ऎसे कलाकारों की दो श्रेणियां हैं। एक तो वह जो हर तरह के हुनर में माहिर हैं। हर तरह का खेल जानते हैं। फिर भी दिखाना नहीं चाहते। कभी मूड खराब होता है। कभी मन हीं होता। कभी आलस्य घेर लेता है। दूसरी श्रेणी उन कलाकारों की है जिनमें हुनर का ही अभाव होता है। इसके बावजूद वह वरिष्ठ हैं। सम्माननीय हैं। ओहदे के लिहाज से भी बड़े हैं। तनख्वाह के हिसाब से भी भारी-भरकम हैं। ऎसे वरिष्ठ कलाकार छोटे-मोटे कलाकारों को 'हांकने' का काम करते हैं। यह शो करो। वह शो करो। तुम्हारा शो अच्छा नहीं था। ठीक से हुनर दिखाओ। आदि-आदि। उनकी इस सक्रियता से ऎसा लगता है कि वह वाकई 'बड़े' कलाकार हैं। जानकार हैं। हुनरमंद हैं। यही उनकी कला है। यही उनका हुनर है।
ऎसे कलाकार रिंग में भले ही हुनर न दिखाते हों। रिंग के बाहर बहुत से 'हुनर' दिखाते हैं। बड़े-बड़े खेल करते हैं। पूरे इंट्रस्ट और परफेक्शन के साथ। रिंग के बाहर खेल दिखाने का यही 'परफेक्शन' ही उनकी योग्यता है। टेलेंट हैं। फन है। हुनर है। ऎसे कलाकारों में यह टेलेंट कूट-कूट कर भरा होता है। इस श्रेणी में ज्यादातर वरिष्ठ कलाकार आते हैं। खासकर गैंडे, सियार, लोमड़ी, गीदड़ और हाथी।
हाथियों और गैंडों के बीच जबरदस्त कंपटीशन है। दोनों का एक ही लक्ष्य है। चीफ रिंग मास्टर की कुर्सी तक पहुंचना। इस मामले में गैंडे ज्यादा आगे रहते हैं। उनकी चमड़ी ज्यादा मोटी है। गैंडों पर किसी बात का असर नहीं पड़ता। वह रोज आते हैं। बिना कोई गैप किए। छुट्टी कभी-कभार ही लेते हैं। मजबूरी में। उन्हें डर सताता रहता है। कहीं उनकी गैरमौजूदगी में हाथी चीफ रिंग मास्टर की कुर्सी पर न बैठ जाए। या फिर मौका मिलते ही सर्कस से उसका पत्ता न साफ करवा दे। इसीलिए सर्कस में हाथी और गैंडे हर वक्त उपस्थित रहते हैं।
अगला नंबर आता है सियार का। सियार की फितरत थोड़ी जुदा है। उसकी कोशिश होती है कोई सर्कस में उसे देख न पाए। न चीफ रिंग मास्टर। न सीनियर-जूनियर रिंग मास्टर। देख लेंगे तो खतरा बना रहता है। कहीं कह न दें कि इस शो की तैयारी कर लो। वह शो कर लो। कई बार कह भी दें तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता। सियार की चमड़ी भी मोटी हो चुकी है। हंटर फटकारो। तीर चलाओ। या फिर डंडा बरसाओ। सब सह लेंगे। हुनर नहीं दिखाएंगे। वरिष्ठ कलाकार जो हैं।
गैंडे, हाथी, सियार, लोमड़ी जैसे कलाकार सर्कस की दुनिया में बहुत मशहूर हैं। सभी सर्कस के लोग इन्हें जानते हैं। पहचानते हैं। बड़े-बड़े सर्कस के चीफ रिंग मास्टर तक उन्हें मानते हैं। बाहर इन कलाकारों के बारे में बहुत बड़ी-बडी़ बाते प्रचलित होती हैं। मसलन वह बहुत 'बड़े' कलाकार हैं। बड़े फनकार हैं। कई सर्कस के खिलाड़ी रह चुके हैं। कई सर्कस का पानी पी चुके हैं। कई को पानी पिला चुके हैं। ढेरों खेल कर चुके हैं। बड़े-बड़े शो दिखा चुके हैं। उनके सारे शो हिट हैं। वह हिट हैं। सुपर हिट। लेकिन नजदीक से देखने पर हकीकत कुछ और ही लगती है। वह सर्कस के मालिकों, कर्ताधर्ताओं और चीफ रिंग मास्टर के दिल में तो पहुंच रखते हैं। दर्शकों के दिलों में नहीं। यही सच है। यही सर्कस है। (जारी...)





1 comments:
सही कहा है भाई इन गैंडों और हाथियों से सर्कस के छोटे मोटे कलाकार बहुत परेशान रहते हैं। सर्कस के कलाकारों पर जबरदस्त अध्ययन है आपका। बधाई
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