द ग्रेट सर्कस ऑफ न्यूजरूम 11
रविवार, 24 अक्तूबर 2010
सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ें- एक दो तीन चार पांच छहसात आठ नौ दस
सर्कस में आज एक नया कलाकार आया है। बहुत स्मार्ट है। पहले वाले से भी ज्यादा। सब उसे कंगारू कहते हैं। कहते हैं बहुत अच्छा खेल दिखाता है। जिस सर्कस से आया है वहां भी उसके कई किस्से मशहूर हैं। सुना है कई 'खेल' दिखाए हैं। सर्कस वाले बताते हैं कि उसे आस्ट्रेलिया से बुलाया गया है। इंटरनेशनल खिलाड़ी है। लेकिन हरकतों से खालिस देसी लगता है। कभी यहां मुंह मारता है, कभी वहां। उछलना उसकी सबसे बड़ी खूबी है। जब देखो तब पूरे न्यूज रूम में उछलता रहता है। कभी अपने शो को लेकर। कभी अपने आइडिये (चुराये हुए) को लेकर। कोई छोटा सा भी काम करता है तो न्यूज रूम के खूब चक्कर लगाता है। खूब उछलता है। कूदता है। कभी चीफ के केबिन में जाता है, कभी न्यूज रूम में दौड़ लगाता है। गोया पूरे सर्कस में वही सबसे बड़ा आइडियाबाज है। चीफ के सामने आइडिया तो चुटकियों में बेचता है। बिल्कुल सब्जी की तरह। सर्कस न हुआ सब्जी बाजार हो गया। जब चाहा ताजा बताकर बेच दिया। साथ में मौलिक का ठप्पा भी लगा दिया।
कंगारू में ऎसी ढेरों खूबिया हैं। देसी कलाकार तो उसे देखते ही खुद को दीन-हीन समझने लगते हैं। गाहे-बगाहे फिरंगी जुबान बोलकर वह उन्हें और भी हीन बना देता है। चुप करा देता है। उसके बाद गर्दन ऊंची करके वह पूरे न्यूज रूम में शान से घूमता है। तब लगता है कि सर्कस में उससे बड़ा कलाकार कोई नहीं। मुमकिन है वह खुद भी ऎसा ही सोचता हो। समझने में बुराई भी क्या है? सर्कस के लिए जो भी हुनर चाहिए वो सब उसके पास हैं। भारी तादाद में कूट-कूट कर भरे हैं। ऊपर से लेकर नीचे तक।
कंगारू सर्कस में राज करने आया है। काम करने नहीं। कंगारू का मानना है कि काम तो गधे, कबूतर और चूहे जैसे जानवर करते हैं। चूहे और गधे तो जब देखो तब जुटे रहते हैं। नए-नए शो की परिकल्पना को साकार करने में। बिल्कुल सरकारी दफ्तर के बाबू की माफिक। कोई उन्हें कुछ नहीं समझता। लेकिन वो खुद को बड़ा तीसमार खां समझते हैं। ग्रेट फनकार समझते हैं। उन्हें गलतफहमी है। पूरा सर्कस वही चलाते हैं। बेचारे। यह नहीं जानते कि सर्कस तो शाश्वत है। वह नहीं रहेंगे तो भी चलता रहेगा। दौड़ता रहेगा। हांफता रहेगा। सर्कस की दुनिया में वैसे भी गधों और चूहों की कमी नहीं है। एक बुलाइये हजार चले आते हैं। लाइन लगाकर। सिर झुकाकर। गिड़गिड़ाकर। दौड़ते हुए। भागते हुए।
सर्कस में हर फनकार की बस एक गुजारिश होती है। ख्वाहिश होती है। एक बार शो दिखाने का मौका मिल जाए। सर्कस में एंट्री मिल जाए। उनका हुनर दर्शकों तक पहुंच जाए। चीफ की थोड़ी सी दया हो जाए। उसके बाद तो बाहर निकलने को बेचैन उनकी प्रतिभा को चैन आ जाएगा। हुनर बाहर आएगा तो देखकर चीफ खुश हो जाएगा। ताली न भी बजाए, एक बार उसकी तरफ देख ही ले तो वो धन्य हो जाएगा। वाह रे सर्कस। वाह रे सर्कस के कलाकार।
सर्कस का हर चूहा, गधा, बिल्ली, कबूतर कमोबेश ऎसा ही सोचता है। सियार, लोमली, बिल्ली, भालू, गिद्ध और गैंडे जैसे सीनियर कलाकार भी ऎसा ही सोचते हैं। उनकी बस यही कोशिश रहती है कि चीफ रिंग मास्टर उनका फन निहार ले। हुनर देख ले। ताकि सर्कस में उनकी कीमत कुछ बढ़ जाए। फिर वह भी कंगारू की तरह सिर उठाकर न्यूजरूम में घूम सके। खुद को ग्रेट फनकार बता सकें। सर्कस के अंदर भी और बाहर भी।
ख्वाहिश भी बड़ी अजीब चीज है। चूहा सोचता है कि चीफ खुश हो जाएगा तो उसे सियार की जगह दे देगा। सियार सोचता है कि चीफ खुश होगा तो उसे गैंडे की जगह बैठा देगा। गैंडा सोचता है कि चीफ खुश होकर उसे सुपर सीनियर रिंग मास्टर बना देगा। सुपर सीनियर सोचता है कि वह तो सीधे चीफ बनने लायक है। जितना बड़ा सर्कस उतने ज्यादा कलाकार। जितने ज्यादा कलाकार उतनी ज्यादा ख्वाहिशें। शो भाड़ में जाए। दर्शक भाड़ में जाएं। दर्शकों को शो पसंद आए या ना आए, उनकी बला से। चीफ को शो पसंद आना चाहिए। यही हर कलाकार की ख्वाहिश है। यही सर्कस है। (जारी...)
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2 comments:
इस बार बहुत देर बाद आये लेकिन सर्कस पहले जैसा ही रूचिकर है। उम्मीद है अगली किस्त जल्दी पेश करेंगे।
ye kangaroo kab aya hai bhai jara saf-saf batao ???
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