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सर्कस में लंगूरों की भी अच्छी तादाद है। लंगूर अकेले नहीं रहते। टोलियों में रहते हैं। टोलियों में खेल दिखाते हैं। जंगल की तरह ही सर्कस में भी लंगूरों ने अपना-अपना इलाका बांट रखा है। एक लंगूर दूसरे के इलाके में दखल नहीं देता। अगर कोई ऐसा करने की हिमाकत करता है तो दूसरे लंगूर को यह कतई बर्दाश्त नहीं होता। इसी चक्कर में कई बार लंगूरों के बीच शीत युद्ध छिड़ जाता है।
वैसे लंगूरों के बीच शीत युद्ध तो हमेशा ही चलता रहता है। एक लंगूर दूसरे लंगूर को मात देने में जुटा रहता है। लगा रहता है। भिड़ा रहता है। दोनों तरफ से तरह-तरह की चालें चली जाती हैं। गोटियां बैठाई जाती हैं। कोई राजा को पटाता है तो कोई वजीर को। तो कोई मोहरों के जरिये ही विजेता बनने की कोशिश करता है। लंगूरों के इस खेल में पूरी तरह किसी की जीत नहीं होती। किसी की हार नहीं होती। कभी कोई भारी पड़ता है, कभी कोई। लेकिन शह और मात का यह खेल कभी खत्म नहीं होता। हर लंगूर की कोशिश होती है खुद को तीसमार खां साबित करने की।
चूहे-बिल्ली के बीच ही सही, अपनी सत्ता कायम करने के लिए लिए लंगूर क्या-क्या नहीं करता। हरदम परेशान रहता है। रात-रात भर जागता रहता है। इधर-उधर भागता रहता है। शांत तो वह बैठ ही नहीं सकता। अगर बैठा तो दूसरा लंगूर बाजी मार लेगा। यह 'डर' लंगूर को हर वक्त परेशान किए रहता है। जब वह शो की तैयारी कर रहा होता है तब भी। जब वह सर्कस से बाहर होता है तब भी।
लंगूरों का काम है सर्कस के बंदरों पर काबू रखना। चूहे, बिल्ली, गीदड़ जैसे छोटे-मोटे कलाकारों को वश में रखना। लंगूर इन छोटे-मोटे कलाकारों को कंट्रोल में रखने की पूरी कोशिश करते हैं।
इस बात का पूरा खयाल रखा जाता है कि कोई चूहा-बिल्ली चूं-चपड़ न करे। इसीलिए लंगूर कभी इन्हें आंख दिखाता है। कभी दांत दिखाता है। तो कभी पूंछ फटकार कर डराता है। बेचारे छोटे-मोटे कलाकर चुप रह जाते हैं। सब सह जाते हैं। मन मसोसकर। काफी कुछ सोचकर। कई बार छोटे-मोटे कलाकारों को भी गुस्सा आ जाता है। वह मुकाबले की मुद्रा में आ जाते हैं। तब लंगूर की बोलती बंद हो जाती है। वह दुम दबाने में ही भलाई समझता है। आखिर लंगूरों की भी अपनी सीमाएं हैं। सरहदें हैं जिन्हें वह लांघ नहीं सकते।
अलग-अलग सर्कस में लंगूरों की अलग-अलग तादाद होती है। जितना बड़ा सर्कस उतने ज्यादा लंगूर। ये लंगूर खुद को चीफ रिंग मास्टर से कम नहीं समझते। फर्क सिर्फ इतना है कि चीफ रिंग मास्टर पूरे सर्कस पर काबू रखता है। ये लंगूर सर्कस के कुछ कलाकारों पर। काबू में रखने के मामले में चीफ रिंग मास्टर लंगूरों का आदर्श है। लंगूर भी हर वक्त उसके जैसा बनने की कोशिश करते हैं। इस गफलत में कई बार उन्हें गलतफहमी भी हो जाती है। वह खुद को चीफ रिंग मास्टर समझ बैठते हैं।
यह सर्कस भी अजीब है। हर खिलाड़ी खुद को 'सबसे बड़ा खिलाड़ी' समझता है। जो लंगूर जितनी ज्यादा उछल-कूद करता है, चीफ रिंग मास्टर उसे उतना ही ज्यादा पसंद करता है। चीफ को लगता है कि वही सबसे ज्यादा एक्टिव है। वही सबसे ज्यादा होनहार है। वही सबसे बड़ा कलाकार है। इसीलिए कई बार लंगूर चीफ को देखते ही उछलना शुरू कर देता है। कूदना शुरू कर देता है। छोटे-मोटे कलाकारों पर खीं-खीं करना शुरू कर देता है। चीं-ची करना शुरू कर देता है। सर्कस में सब इस 'खेल' से वाकिफ हो चुके हैं। यकीनन चीफ चीफ रिंग मास्टर भी। चीफ सब जानता है, लेकिन जाहिर नहीं करता। लंगूरों में खुशफहमी बनी रहे तो हर्ज ही क्या है? इससे लंगूरों को हौसला मिलता है। हुनर दिखाने की प्रेरणा मिलती है। वैसे हुनर हो या ना हो, वह दिखना जरूर चाहिए। सर्कस में जो दिखता है वही बिकता है। यही हकीकत है। यही सर्कस है। (जारी...)
सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ें- एक दो तीन चार पांच छहसात आठ नौ दस
सर्कस में लंगूरों की भी अच्छी तादाद है। लंगूर अकेले नहीं रहते। टोलियों में रहते हैं। टोलियों में खेल दिखाते हैं। जंगल की तरह ही सर्कस में भी लंगूरों ने अपना-अपना इलाका बांट रखा है। एक लंगूर दूसरे के इलाके में दखल नहीं देता। अगर कोई ऐसा करने की हिमाकत करता है तो दूसरे लंगूर को यह कतई बर्दाश्त नहीं होता। इसी चक्कर में कई बार लंगूरों के बीच शीत युद्ध छिड़ जाता है।
वैसे लंगूरों के बीच शीत युद्ध तो हमेशा ही चलता रहता है। एक लंगूर दूसरे लंगूर को मात देने में जुटा रहता है। लगा रहता है। भिड़ा रहता है। दोनों तरफ से तरह-तरह की चालें चली जाती हैं। गोटियां बैठाई जाती हैं। कोई राजा को पटाता है तो कोई वजीर को। तो कोई मोहरों के जरिये ही विजेता बनने की कोशिश करता है। लंगूरों के इस खेल में पूरी तरह किसी की जीत नहीं होती। किसी की हार नहीं होती। कभी कोई भारी पड़ता है, कभी कोई। लेकिन शह और मात का यह खेल कभी खत्म नहीं होता। हर लंगूर की कोशिश होती है खुद को तीसमार खां साबित करने की।चूहे-बिल्ली के बीच ही सही, अपनी सत्ता कायम करने के लिए लिए लंगूर क्या-क्या नहीं करता। हरदम परेशान रहता है। रात-रात भर जागता रहता है। इधर-उधर भागता रहता है। शांत तो वह बैठ ही नहीं सकता। अगर बैठा तो दूसरा लंगूर बाजी मार लेगा। यह 'डर' लंगूर को हर वक्त परेशान किए रहता है। जब वह शो की तैयारी कर रहा होता है तब भी। जब वह सर्कस से बाहर होता है तब भी।
लंगूरों का काम है सर्कस के बंदरों पर काबू रखना। चूहे, बिल्ली, गीदड़ जैसे छोटे-मोटे कलाकारों को वश में रखना। लंगूर इन छोटे-मोटे कलाकारों को कंट्रोल में रखने की पूरी कोशिश करते हैं।
इस बात का पूरा खयाल रखा जाता है कि कोई चूहा-बिल्ली चूं-चपड़ न करे। इसीलिए लंगूर कभी इन्हें आंख दिखाता है। कभी दांत दिखाता है। तो कभी पूंछ फटकार कर डराता है। बेचारे छोटे-मोटे कलाकर चुप रह जाते हैं। सब सह जाते हैं। मन मसोसकर। काफी कुछ सोचकर। कई बार छोटे-मोटे कलाकारों को भी गुस्सा आ जाता है। वह मुकाबले की मुद्रा में आ जाते हैं। तब लंगूर की बोलती बंद हो जाती है। वह दुम दबाने में ही भलाई समझता है। आखिर लंगूरों की भी अपनी सीमाएं हैं। सरहदें हैं जिन्हें वह लांघ नहीं सकते।अलग-अलग सर्कस में लंगूरों की अलग-अलग तादाद होती है। जितना बड़ा सर्कस उतने ज्यादा लंगूर। ये लंगूर खुद को चीफ रिंग मास्टर से कम नहीं समझते। फर्क सिर्फ इतना है कि चीफ रिंग मास्टर पूरे सर्कस पर काबू रखता है। ये लंगूर सर्कस के कुछ कलाकारों पर। काबू में रखने के मामले में चीफ रिंग मास्टर लंगूरों का आदर्श है। लंगूर भी हर वक्त उसके जैसा बनने की कोशिश करते हैं। इस गफलत में कई बार उन्हें गलतफहमी भी हो जाती है। वह खुद को चीफ रिंग मास्टर समझ बैठते हैं।
यह सर्कस भी अजीब है। हर खिलाड़ी खुद को 'सबसे बड़ा खिलाड़ी' समझता है। जो लंगूर जितनी ज्यादा उछल-कूद करता है, चीफ रिंग मास्टर उसे उतना ही ज्यादा पसंद करता है। चीफ को लगता है कि वही सबसे ज्यादा एक्टिव है। वही सबसे ज्यादा होनहार है। वही सबसे बड़ा कलाकार है। इसीलिए कई बार लंगूर चीफ को देखते ही उछलना शुरू कर देता है। कूदना शुरू कर देता है। छोटे-मोटे कलाकारों पर खीं-खीं करना शुरू कर देता है। चीं-ची करना शुरू कर देता है। सर्कस में सब इस 'खेल' से वाकिफ हो चुके हैं। यकीनन चीफ चीफ रिंग मास्टर भी। चीफ सब जानता है, लेकिन जाहिर नहीं करता। लंगूरों में खुशफहमी बनी रहे तो हर्ज ही क्या है? इससे लंगूरों को हौसला मिलता है। हुनर दिखाने की प्रेरणा मिलती है। वैसे हुनर हो या ना हो, वह दिखना जरूर चाहिए। सर्कस में जो दिखता है वही बिकता है। यही हकीकत है। यही सर्कस है। (जारी...)सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ें- एक दो तीन चार पांच छहसात आठ नौ दस
13 comments:
यही सर्कस तो सियासत की दुनियाँ में भी जारी है दशों से। अच्छा पोस्ट।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
बहुत बढ़िया चित्र खींचा है आपने। बधाई स्वीकार करें। इस बार काफी इंतजार कराया। आशा करता हूं अगली कड़ी जल्द पेश करेंगे।
Too bhi langoor!!!!
Saale Hanumaan ko gaali detaa hai!!!
Tu jhutaaa teraa khandaan jhootha.
दोस्तों ऊपर वाले बेनामी साहब की टिप्पणी पर जरा गौर फरमाएं। यह साहब हमे झूठा ठहरा रहे हैं। चलिए मान लिया हम झूठे हैं। लेकिन वह खुद बहुत सच्चे हैं तो उनमें कम से कम इतनी हिम्मत तो होनी चाहिए थी कि अपनी पहचान के साथ सामने आते। खैर इस टिप्पणी को हटाने की बजाए हम यही दुआ करेंगे कि हनुमान जी इन्हें सद् बुद्धि दें।
रोचक आलेख . उम्दा बधाई
बहुत अच्छा....लेकिन राजीव जी ये तो बताइए ये सर्कस आज कल कहां चल रहा है...आप कहेंगे सभी जगह लेकिन कोई जगह तो होगी ही जहां से आपको प्रेरणा मिली.......
लंगूरों का जो खाका खींचा गया है, वो पूरी तरह से ठीक है। सच है हर लंगूर...चाहे उसकी औकात कुछ भी हो...अपने आपको चीफ रिंग मास्टर से कम तो कतई नहीं ही समझता है। मजा तो ये है कि दिन में खरगोश और बंदर बने रहने वाले सर्कस के के कुच पात्र भी जब गलती से रात की पाली में लंगूर की कुर्सी पर आते हैं तो उनकी आदत भी दूसरे लंगूरों जैसी ही हो जाती है। ये किसी एक सर्कस की बात नहीं...अमूमन हर सर्कस में अवस्थित है...खैर, लंगूर, मोरनी, सियार वगैरह के बाद अब आपकी ओर से सर्कस के सबसे निरीह यानी रन पर बैठने वाले प्राणियों की हालत पर भी आपका नजरिया देखने का इंतजार रहेगा। और हां, भाई बेनामी जी की टिप्पणी पर मैं यही कहूंगा कि अगर सर्कस के लंगूर में उन्हें हनुमान जी का निरादर नजर आ रहा है तो उन्हें जल्दी ही अपने दिमाग का इलाज करा लेना चाहिए।
बेहतरीन रचना ....!!
रविन्द्र जी ऐसी बेनामी बेसिर पैर की टिप्पणियों की परवाह न किया करें .....आप अपना लेखन जारी रखें ....!!
बढिया पोस्ट लिखी है।
आनंद आया।
bahut acchi post bhai .. circus to hamari raajniti me bhi hai aur apki post yahi darshaati hai ...
badhai
vijay
pls read my new poem "झील" on my poem blog " http://poemsofvijay.blogspot.com
आपने लंगूरो के बारे में जो कहा वो सही है, बहुत से लंगुर तो खुद को भगवान भी समझने लगे हैं, और सर्कस में भर्ती कराने का ठेका भी लेने लगे हैं, उम्मीद है जल्दी ही आपकी अगली कड़ी पढ़ने को मिलेगी, वैसे कुछ किरदारो पर जरा ज्यादा रोशनी डालेंगे तो और मजा आएगा। वैसे आपने एक बात छोड़ दी है की किस तरह से ये लंगूर, गैंडे, और बैल सर्कस में एंट्री कराने के नाम पर नए कबूतरियो,मुर्गियो को अपने झांसे में लेते हैं, और उन्हे घुमाते हैं....कुछ तो इतने ज्ञानी बन जाते हैं कि सर्कस में आने वाले नए कलाकारो को सिर्फ ज्ञान बाटते हैं और अपनी पुरानी कहानी सुना सुना कर बोर कर देते हैं।
Ravinder Sir,
Its a good thiniking & creation. Good luck to you and I aslo want to say something.
Girtain hai sah sawaar hi maindane jang main.
Wo tifl kiya girain jo Ghutno ke bal chalain.
Aap sah sawaar hain.
regards
NEERAJ KARAN SINGh
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