_______________________________________________
सर्कस में हाथी, गैंडे और बैल भी हैं। हाथियों की तादाद जरा ज्यादा है। इनमें भी ज्यादातर सफेद हाथी है। जितना बड़ा सर्कस उतने ज्यादा सफेद हाथी। सर्कस के इन कलाकारों ने खुद को इतना ज्यादा मांजा है कि काले से सफेद हो गए हैं। लंबा वक्त लगा है। इस प्रक्रिया में। वक्त के साथ-साथ उनकी कीमत बढ़ती गई। गहरा रंग उतरता गया। उजला रंग निखरता गया। कभी वह काले थे, अब वह सफेद नजर आते हैं। सबके सब। हाथी, गैंडे और बैल सभी। दूधिया सफेद रंग। यह रंग इन पर पूरी तरह चढ़ गया है। खूबसरती को बढ़ाने वाला। वरिष्ठता को दिखाने वाला। सफेद बनने के लिए पता नहीं क्या-क्या जतन किए होंगे? पता नहीं कितने किलो फेयर एंड लवली लगाई होगी। कुछ तो रातोंरात भी काले से सफेद हो गए। उन्होंने शायद माइकल जैक्सन तकनीक का इस्तेमाल किया होगा। या फिर 'कोई और' तकनीक?
गैंडे, हाथी और बैल खुद को एक दूसरे का अच्छा दोस्त दिखाने की कोशिश करते हैं। हमेशा। लेकिन सच तो यह है कि इनकी आपस में कभी नहीं बनती। सभी खुद को एक-दूसरे से बड़ा खिलाड़ी मानते हैं। बेजोड़ कलाकार मानते हैं। उन्हें हर वक्त यह गलतफहमी रहती है कि वह सर्कस के सबसे हुनरमंद खिलाड़ी हैं। वरिष्ठ तो खैर हैं ही। उनकी यह गलतफहमी कई बार सर्कस के लिए परेशानी का सबब बन जाती है। तब जब वह आपस में ही सींग भिड़ा बैठते हैं।
गैंडे, हाथी और बैल से कोई पंगा नहीं लेना चाहता। हाथी के पैरों तले कुचले जाने का डर है। गैंडा बहुत पहुंच वाला है। सर्कस से ही निकलवा देगा। बैल तो हर वक्त सींग मारने की फिराक में रहता है। कभी-कभी हाथी और गैंडे आपस में ही भिड़ जाते हैं। गैंडे का एक सींग और हाथी की सूंड, मुकाबला जबर्दस्त होता है। दर्शक भी खूब मिलते हैं। मल्टीस्टोरी बिल्डिंग हिल जाती है। पूरा सर्कस कांप उठता है। चूहे, बिल्ली, भालू, बंदर, गीदड़, मोरनी, मुर्गी सब डर जाते हैं। दुबक जाते हैं।
सर्कस का रिंग जंग का मैदान बन जाता है। गैंडा जब भी गुस्से में होता है तो सींग मारता है। उसका वार हमेशा की तरह जोरदार होता है। गैंडे की खाल मोटी है। सर्कस में आने के बाद और भी मोटी हो गई है। गैंडा दौड़ा-दौड़ा कर हाथी को मारता है। गैंडा बेखौफ है। गैंडे को किसी का डर नहीं। कहते हैं कि उसके सिर पर चीफ का हाथ है। तभी तो उसके हमले से आहत हाथी चिग्घाड़ता है, फिर चुप हो जाता है। हाथी को बहुत कुछ सोचना पड़ता है। इसीलिए हाथी कई बार गैंडे के सामने 'कमजोर' पड़ जाता है। गैंडा हाईप्रोफाइल है। विदेश से कलाएं सीखकर आया है। विदेशी बोली भी बोलता है। उसके पास विदेशी सर्कस का कलाकार होने का तमगा भी है। हाथी देशी कलाकार है। घने जंगल से निकलकर आया हुआ। गोरा रंग भी उसने अपने 'हुनर' की बदौलत पाया है। यह उसकी 'मेहनत की कमाई' है। हाथी के दांत बहुत लंबे हैं, जिन्हें वह बात-बात पर निपोरता रहता है। हाथी के दांत देखकर चीफ रिंग मास्टर भी खुश हो जाता है। दांत हाथी के हथियार हैं। दिखाने वाले दांत। खाने वाले दांतों को वह अंदर ही रखता है। इस्तेमाल उनका भी कम नहीं करता। पता नहीं क्या-क्या 'खाता' रहता है। गैंडे ज्यादातर मामलों में हाथियों से आगे रहते हैं। गहरा रंग भले ही नहीं उतर पाया, बाकी किसी भी मामले में पीछे नहीं। अनुभव बहुत है। 'खेल' भी बहुत सारे आते हैं।

हाथी अब खेल नहीं दिखाता। सफेद हो जाने के बाद तो बिल्कुल भी नहीं। गैंडा जरूर कभी-कभार शो में कूद पड़ता है। कभी कबूतर बनकर तो कभी सूत्रधार बनकर। बैल को तो सींग मारने के सिवा कुछ आता ही नहीं। जब देखो तब रिंग के आसपास सींग उठाए घूमता रहता है। दौड़ता रहता है। लड़ने-भिड़ने को हर वक्त तैयार। शायद यह उसका जन्मजात गुण है। शायद इसीलिए उसे सर्कस में लाया भी गया है। बैल किसी शो में सहयोग करना अपनी तौहीन समझता है। बैल को कभी-कभी कबूतर भी बना दिया जाता है। तब वह कबूतर की तरह फुदकने की कोशिश करता है। न होते हुए भी हुनर दिखाने की कोशिश करता है। स्टाइल मारने की कोशिश करता है। दर्शक उसे देखकर हंसते हैं। जोकर तालियां बजाता है। बिल्लियों, मोरनियों और मुर्गियों के लिए वह हंसी का पात्र बन जाता है।
बैल अक्सर छोटे-मोटे कलाकारों को 'हांकने' का काम करता है। यह शो करो। वह शो करो। तुम्हारा शो अच्छा नहीं था। ठीक से हुनर दिखाओ। आदि-आदि। उसकी इस सक्रियता से लगता है कि वह वाकई 'बड़ा' कलाकार हैं। जानकार है। हुनरमंद है। बैल रिंग पर खेल नहीं दिखा पाता। रिंग के बाहर वह बहुत से 'हुनर' दिखाता है। बड़े-बड़े 'खेल' करता है। पूरे 'इंट्रस्ट' और 'परफेक्शन' के साथ। रिंग के बाहर खेल दिखाने का यही 'परफेक्शन' उसकी योग्यता है। टेलेंट हैं। फन है। हुनर है। बैल में यह 'टेलेंट' कूट-कूट कर भरा है। वह दूसरे कई तरह के 'खेल' जानता है। तभी तो वह चीफ रिंग मास्टर का चहेता है। वैसे वह रिंग पर खेल दिखाए भी तो कैसे? उसे खेल दिखाना कम और गड़बड़ करना ज्यादा आता है। कई लोग तो बैल को देखकर गलतफहमी का शिकार हो जाते हैं। उसे सर्कस की बजाय जंगल का जानवर समझ बैठते हैं। इसमें उनकी गलती नहीं। बैल का 'व्यक्तित्व' ही ऎसा है। वैसे भी सर्कस में बैल के होने का 'कांसेप्ट' दर्शकों के गले नहीं उतरता। वहीं गैंडे को देखिए। कितना फुर्तीला है। दिन भर पूरे रिंग पर इधर से उधर भागता रहता है। जैसे सारा सर्कस सिर पर उठा रखा हो।
हाथी, गैंडे और बैल हमेशा सर्कस को बदल डालने की बात करते हैं। सारे शो हिट करा देने की बात करते हैं। गोया सब कुछ बदल डालेंगे। लेकिन अफसोस, बदलता कुछ नहीं। वही ढाक के तीन पात। हाथी, गैंडे और बैल सर्कस के पुराने कलाकार हैं। यह कलाकार सर्कस की दुनिया में बहुत मशहूर हैं। सभी सर्कस के लोग इन्हें जानते हैं। पहचानते हैं। बड़े-बड़े सर्कस के चीफ रिंग मास्टर तक उन्हें मानते हैं। इन कलाकारों के बारे में बहुत बड़ी-बडी़ बाते मशहूर होती हैं। मसलन वह बहुत 'बड़े' कलाकार हैं। कई सर्कस के खिलाड़ी रह चुके हैं। ढेरों खेल कर चुके हैं। बड़े-बड़े शो दिखा चुके हैं। उनके सारे शो हिट हैं। वह हिट हैं। सुपर हिट। दूर के ढोल हमेशा सुहावने होते हैं। नजदीक से हकीकत कुछ और ही नजर आती है। भड़कीले रंग स्याह नजर आते हैं। यही हकीकत है। यही सर्कस है।(जारी...)
सर्कस में हाथी, गैंडे और बैल भी हैं। हाथियों की तादाद जरा ज्यादा है। इनमें भी ज्यादातर सफेद हाथी है। जितना बड़ा सर्कस उतने ज्यादा सफेद हाथी। सर्कस के इन कलाकारों ने खुद को इतना ज्यादा मांजा है कि काले से सफेद हो गए हैं। लंबा वक्त लगा है। इस प्रक्रिया में। वक्त के साथ-साथ उनकी कीमत बढ़ती गई। गहरा रंग उतरता गया। उजला रंग निखरता गया। कभी वह काले थे, अब वह सफेद नजर आते हैं। सबके सब। हाथी, गैंडे और बैल सभी। दूधिया सफेद रंग। यह रंग इन पर पूरी तरह चढ़ गया है। खूबसरती को बढ़ाने वाला। वरिष्ठता को दिखाने वाला। सफेद बनने के लिए पता नहीं क्या-क्या जतन किए होंगे? पता नहीं कितने किलो फेयर एंड लवली लगाई होगी। कुछ तो रातोंरात भी काले से सफेद हो गए। उन्होंने शायद माइकल जैक्सन तकनीक का इस्तेमाल किया होगा। या फिर 'कोई और' तकनीक?
गैंडे, हाथी और बैल से कोई पंगा नहीं लेना चाहता। हाथी के पैरों तले कुचले जाने का डर है। गैंडा बहुत पहुंच वाला है। सर्कस से ही निकलवा देगा। बैल तो हर वक्त सींग मारने की फिराक में रहता है। कभी-कभी हाथी और गैंडे आपस में ही भिड़ जाते हैं। गैंडे का एक सींग और हाथी की सूंड, मुकाबला जबर्दस्त होता है। दर्शक भी खूब मिलते हैं। मल्टीस्टोरी बिल्डिंग हिल जाती है। पूरा सर्कस कांप उठता है। चूहे, बिल्ली, भालू, बंदर, गीदड़, मोरनी, मुर्गी सब डर जाते हैं। दुबक जाते हैं।
सर्कस का रिंग जंग का मैदान बन जाता है। गैंडा जब भी गुस्से में होता है तो सींग मारता है। उसका वार हमेशा की तरह जोरदार होता है। गैंडे की खाल मोटी है। सर्कस में आने के बाद और भी मोटी हो गई है। गैंडा दौड़ा-दौड़ा कर हाथी को मारता है। गैंडा बेखौफ है। गैंडे को किसी का डर नहीं। कहते हैं कि उसके सिर पर चीफ का हाथ है। तभी तो उसके हमले से आहत हाथी चिग्घाड़ता है, फिर चुप हो जाता है। हाथी को बहुत कुछ सोचना पड़ता है। इसीलिए हाथी कई बार गैंडे के सामने 'कमजोर' पड़ जाता है। गैंडा हाईप्रोफाइल है। विदेश से कलाएं सीखकर आया है। विदेशी बोली भी बोलता है। उसके पास विदेशी सर्कस का कलाकार होने का तमगा भी है। हाथी देशी कलाकार है। घने जंगल से निकलकर आया हुआ। गोरा रंग भी उसने अपने 'हुनर' की बदौलत पाया है। यह उसकी 'मेहनत की कमाई' है। हाथी के दांत बहुत लंबे हैं, जिन्हें वह बात-बात पर निपोरता रहता है। हाथी के दांत देखकर चीफ रिंग मास्टर भी खुश हो जाता है। दांत हाथी के हथियार हैं। दिखाने वाले दांत। खाने वाले दांतों को वह अंदर ही रखता है। इस्तेमाल उनका भी कम नहीं करता। पता नहीं क्या-क्या 'खाता' रहता है। गैंडे ज्यादातर मामलों में हाथियों से आगे रहते हैं। गहरा रंग भले ही नहीं उतर पाया, बाकी किसी भी मामले में पीछे नहीं। अनुभव बहुत है। 'खेल' भी बहुत सारे आते हैं।

हाथी अब खेल नहीं दिखाता। सफेद हो जाने के बाद तो बिल्कुल भी नहीं। गैंडा जरूर कभी-कभार शो में कूद पड़ता है। कभी कबूतर बनकर तो कभी सूत्रधार बनकर। बैल को तो सींग मारने के सिवा कुछ आता ही नहीं। जब देखो तब रिंग के आसपास सींग उठाए घूमता रहता है। दौड़ता रहता है। लड़ने-भिड़ने को हर वक्त तैयार। शायद यह उसका जन्मजात गुण है। शायद इसीलिए उसे सर्कस में लाया भी गया है। बैल किसी शो में सहयोग करना अपनी तौहीन समझता है। बैल को कभी-कभी कबूतर भी बना दिया जाता है। तब वह कबूतर की तरह फुदकने की कोशिश करता है। न होते हुए भी हुनर दिखाने की कोशिश करता है। स्टाइल मारने की कोशिश करता है। दर्शक उसे देखकर हंसते हैं। जोकर तालियां बजाता है। बिल्लियों, मोरनियों और मुर्गियों के लिए वह हंसी का पात्र बन जाता है।
बैल अक्सर छोटे-मोटे कलाकारों को 'हांकने' का काम करता है। यह शो करो। वह शो करो। तुम्हारा शो अच्छा नहीं था। ठीक से हुनर दिखाओ। आदि-आदि। उसकी इस सक्रियता से लगता है कि वह वाकई 'बड़ा' कलाकार हैं। जानकार है। हुनरमंद है। बैल रिंग पर खेल नहीं दिखा पाता। रिंग के बाहर वह बहुत से 'हुनर' दिखाता है। बड़े-बड़े 'खेल' करता है। पूरे 'इंट्रस्ट' और 'परफेक्शन' के साथ। रिंग के बाहर खेल दिखाने का यही 'परफेक्शन' उसकी योग्यता है। टेलेंट हैं। फन है। हुनर है। बैल में यह 'टेलेंट' कूट-कूट कर भरा है। वह दूसरे कई तरह के 'खेल' जानता है। तभी तो वह चीफ रिंग मास्टर का चहेता है। वैसे वह रिंग पर खेल दिखाए भी तो कैसे? उसे खेल दिखाना कम और गड़बड़ करना ज्यादा आता है। कई लोग तो बैल को देखकर गलतफहमी का शिकार हो जाते हैं। उसे सर्कस की बजाय जंगल का जानवर समझ बैठते हैं। इसमें उनकी गलती नहीं। बैल का 'व्यक्तित्व' ही ऎसा है। वैसे भी सर्कस में बैल के होने का 'कांसेप्ट' दर्शकों के गले नहीं उतरता। वहीं गैंडे को देखिए। कितना फुर्तीला है। दिन भर पूरे रिंग पर इधर से उधर भागता रहता है। जैसे सारा सर्कस सिर पर उठा रखा हो।
हाथी, गैंडे और बैल हमेशा सर्कस को बदल डालने की बात करते हैं। सारे शो हिट करा देने की बात करते हैं। गोया सब कुछ बदल डालेंगे। लेकिन अफसोस, बदलता कुछ नहीं। वही ढाक के तीन पात। हाथी, गैंडे और बैल सर्कस के पुराने कलाकार हैं। यह कलाकार सर्कस की दुनिया में बहुत मशहूर हैं। सभी सर्कस के लोग इन्हें जानते हैं। पहचानते हैं। बड़े-बड़े सर्कस के चीफ रिंग मास्टर तक उन्हें मानते हैं। इन कलाकारों के बारे में बहुत बड़ी-बडी़ बाते मशहूर होती हैं। मसलन वह बहुत 'बड़े' कलाकार हैं। कई सर्कस के खिलाड़ी रह चुके हैं। ढेरों खेल कर चुके हैं। बड़े-बड़े शो दिखा चुके हैं। उनके सारे शो हिट हैं। वह हिट हैं। सुपर हिट। दूर के ढोल हमेशा सुहावने होते हैं। नजदीक से हकीकत कुछ और ही नजर आती है। भड़कीले रंग स्याह नजर आते हैं। यही हकीकत है। यही सर्कस है।(जारी...)
8 comments:
हाथी, गैंडे और बैल का बहुत सटीक चित्रण किया है आपने। सब कुछ आंखों के सामने उतर रहा है। गैंडे और हाथी की लड़ाई भी सामान्य सी बात है। मॉडर्न सरकस में ये सब चलता रहता है। इस बार भी लिखा शानदार है। उम्मीद करता हूं अगली कड़ी के लिए ज्यादा इंतजार नहीं करवाएंगे।
सही बात है बैल हमेशा छोटे-मोटे कलाकारों को हांकने का काम करता है और हाथी-गैंडे आपस में भिड़ते रहते हैं। बड़ा शानदार अंदाज है आपका। मजा आ गया पढ़कर। अच्छा लिखा है। बधाई
maza aa gyaa. badiya hai is bar bhi. badhai
भाई साहब सब कैरेक्टर पहचान में आ रहे हैं। लेकिन ये जोकर कौन है, क्या वही जिसे मैं समझ रहा हूं..हा हा हा
अच्छा लिखा है। अगली कड़ी की प्रतीक्षा...
नजदीक से हकीकत कुछ और नजर आती है। भड़कीले रंग स्याह नजर आते हैं। वाकई सही बात कही है आपने।
pratikatam rup se likhi gai is sundar katha ke liye aapko bahut badhai.
सर्कस के रिंग में हाथी और गैंडे की लड़ाई का नजारा करने का सौभाग्य मुझे भी कई बार अपने न्यूज रुम में हो चुका है...हां बैल का पात्र दिमाग पर बहुत जोर लगाने के बाद भी नहीं समझ सका। हालांकि ये कहना गलत होगा की मैंने हाथी और गैंडे को पहचान लिया है...लेकिन अपने मन में कुछ चित्रण करने का अधिकार तो मुझे है ही..
एक टिप्पणी भेजें