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सर्कस में कलाकारों का आना-जाना लगा रहता है। पुराने जाते हैं। नए आते हैं। नए जाते हैं। पुराने आते हैं। कुछ धूनी रमाकर एक ही सर्कस में जम जाते हैं। गोया वहीं से रिटायर होंगे। वहीं से जनाजा उठेगा। वैसे आजकल सर्कस के स्मार्ट कलाकार एक को छोड़कर दूसरा-तीसरा-चौथा सर्कस ज्वाइन करते रहते हैं। यह सिलसिला निरंतर चलता रहता है। किसी नए कलाकार का एक सर्कस को छोड़कर दूसरे में आना-जाना सर्कस के दूसरे कलाकारों के लिए बेहद उत्सुकता का सबब होता है। चूहे से लेकर गीदड़, सियार, भालू, बंदर सब उस नए कलाकार का इतिहास खंगालने में लग जाते हैं।
सर्कस के कई कलाकारों का यही काम होता है। वह दूसरे कलाकारों पर 'नजर' रखते हैं। कौन कहां जा रहा है। जाना चाहता है। पता रखते हैं। सबके बारे में। चूहा हो या लोमड़ी। कबूतर हो या कबूतरी। मोर हो या मोरनी। इन जासूस कलाकारों को 'नजर' रखने में महारत हासिल होती है। जैसे ही कोई कलाकार दूसरे सर्कस का रुख करता है, इन्हें खबर लग जाती है। मोरनियां, मुर्गियां और कबूतरियां खासतौर पर इनके निशाने पर होती हैं। कई बार तो यह जासूस उन पर नजर रखने के चक्कर में दूसरे सर्कस तक 'झांक' आते हैं....
अगर कोई नई मुर्गी, कबूतरी या मोरनी सर्कस में भर्ती हो जाए तब तो कहने ही क्या। चूहे, गीदड़, भालू, सियार से लेकर सीनियर, जूनियर रिंग मास्टर तक वह सभी के आकर्षण का केंद्र बन जाती है। कोई उसकी 'चाल' पर नजर रखता है। कोई उसकी 'ढाल' पर। कोई उसके हुनर की बात करता है। तो कोई बेवजह तारीफ कर उसके नजदीक पहुंचना चाहता है। वह कहां रहती हैं। किसके साथ रहती है। कहां से आती है। कितने बजे आती है। कितने बजे जाती है। सर्कस में उसका शो कितने बजे है। सर्कस के 'स्मार्ट' कलाकारों को सब पता रहता है। वह पल-पल पर नजर रखते हैं। जैसे कोई शिकारी अपने 'शिकार' पर नजर रखता है।
सर्कस में नई मुर्गी, कबूतरी या मोरनी आने से पुरानी को परेशानी हो जाती है। वह फौरन पता करती है, नई मुर्गी कितने पानी में है। किस ओहदे पर आई है। पुराने सर्कस में कौन सा शो करती थी। कौन सा खेल दिखाती थी। यहां कौन सा हुनर दिखाएगी। कौन सा खेल करेगी। आदि-आदि। सब जानने के बाद पुरानी मुर्गी यह प्रचार करने में जुट जाती हैं कि उसके हुनर के सामने नई कुछ भी नहीं। उसकी अदा जितनी कातिल है, नई की कहां। उसकी चाल जितनी मदमस्त है, नई की कहां। वह जितनी खूबसूरत है, नई कहां। जितने फन उसे आते हैं, नई को कहां आते होंगे। उसे आता ही क्या है। जरूर सिफारिश से आई होगी। या फिर...पता नहीं 'कैसे' आई होगी।
चूहे, गीदड़, सियार, भालू की अपनी ही दिक्कतें हैं। अपना खेल छोड़कर वह नई मुर्गी के पीछे पड़ जाते हैं। उनका एक ही काम होता है शिकारी की तरह नई चिड़िया फांसना। इसके लिए जरूरी है उसके बारे में सब कुछ जानना। वो यह तक पता लगा डालते हैं कि नई मुर्गी, मोरनी या फिर कबूतरी किस जंगल में पैदा हुई। कैसे किस सर्कस तक पहुंची। कैसे इस सर्कस तक पहुंची। कितने सर्कस का पानी पीकर आई है। कैसे आई है। कहां से आई है। कितनी पहुंच वाली है। कौन-कौन से हुनर जानती है। किसको-किसको पहचानती है। कौन उसका खास है। वह किसकी खास है। चूहे से लेकर गीदड़, सियार, भालू, चीता, शेर तक सभी की नजरें हर वक्त उसी को घूरती रहती हैं। बेचारी ! सर्कस के बोझ की मारी। चील, बाज, गिद्ध जैसे 'कलाकार' तो हर वक्त उस पर नजरें गड़ाए रहते हैं। कब मौका मिले और झपट पड़ें। वैसे मुर्गी, मोरनी, कबूतरी सब उनके इन खतरनाक इरादों से वाकिफ रहती हैं। उन्हें हर वक्त चील, बाज औऱ गिद्ध से खुद को बचाए रखना पड़ता है। यही उनकी कला है। यही उनका हुनर है।
सर्कस में हर कोई कोशिशों में लगा रहता है। आखिरी वक्त तक। उम्मीदें हर वक्त कायम रहती हैं। चूहे, गीदड़, सियार, शेर, चीता, भालू, चील, बाज, गिद्ध सब भिड़े रहते हैं। पता नहीं कब किसका तीर निशाने पर लग जाए। मुर्गी फंस जाए। मुर्गी भी इस बात को अच्छी तरह समझती है। कई बार वह दिखावे के लिए फंस जाने का नाटक भी करती है। कई बार वाकई फंस जाती है। कभी मर्जी से। कभी धोखे से। कभी मजबूरीवश।
सर्कस में नई मुर्गी औऱ मोरनी के आते ही पुरानी की कीमत कम हो जाती है। चूहे से लेकर चीफ तक के लिए उसका हुनर पुराना हो जाता है। कल तक उसकी तारीफों के पुल बांधे जाते थे। अब सबको उसके फन में खामियां नजर आने लगती हैं। पुरानी मोरनी की चाल भी अच्छी नहीं लगती और ढाल भी। तब पुरानी मुर्गी पहले से ज्यादा लीपना-पोतना शुरू कर देती है। ज्यादा स्टाइल मारना शुरू कर देती है। उसे गुस्सा भी ज्यादा आने लगता है। जरा-जरा सी बात पर। वह हर बात पर अपने जूनियर कलाकारों पर भड़कने लगती है। चिल्लाने लगती है। यही हकीकत है।
एक न एक दिन सर्कस के हर कलाकार को इस कड़वी हकीकत का एहसास होता है। तब वह अपने सर्कस को छोड़कर किसी दूसरे सर्कस का रुख कर लेता है। कभी फायदे के लिए। कभी मजबूरीवश। एक सर्कस से दूसरे-तीसरे-चौथे सर्कस जाने के फंडे पर नए कलाकार ज्यादा यकीन रखते हैं। जब तब इधर-उधर ट्राई मारते रहते हैं। मौका मिलते ही उड़ लेते हैं। नए सर्कस के नए-नए खेलों का हिस्सा बन जाते हैं। इससे उनका रुतबा बढ़ जाता है। वह बड़े कलाकार बन जाते हैं। जूनियर-सीनियर रिंग मास्टर बन जाते हैं। रातों रात। नया सर्कस नया ओहदा। सब कुछ बदला-बदला। नए से अलग पुराने से जुदा। (जारी...)
सर्कस में कलाकारों का आना-जाना लगा रहता है। पुराने जाते हैं। नए आते हैं। नए जाते हैं। पुराने आते हैं। कुछ धूनी रमाकर एक ही सर्कस में जम जाते हैं। गोया वहीं से रिटायर होंगे। वहीं से जनाजा उठेगा। वैसे आजकल सर्कस के स्मार्ट कलाकार एक को छोड़कर दूसरा-तीसरा-चौथा सर्कस ज्वाइन करते रहते हैं। यह सिलसिला निरंतर चलता रहता है। किसी नए कलाकार का एक सर्कस को छोड़कर दूसरे में आना-जाना सर्कस के दूसरे कलाकारों के लिए बेहद उत्सुकता का सबब होता है। चूहे से लेकर गीदड़, सियार, भालू, बंदर सब उस नए कलाकार का इतिहास खंगालने में लग जाते हैं।
सर्कस के कई कलाकारों का यही काम होता है। वह दूसरे कलाकारों पर 'नजर' रखते हैं। कौन कहां जा रहा है। जाना चाहता है। पता रखते हैं। सबके बारे में। चूहा हो या लोमड़ी। कबूतर हो या कबूतरी। मोर हो या मोरनी। इन जासूस कलाकारों को 'नजर' रखने में महारत हासिल होती है। जैसे ही कोई कलाकार दूसरे सर्कस का रुख करता है, इन्हें खबर लग जाती है। मोरनियां, मुर्गियां और कबूतरियां खासतौर पर इनके निशाने पर होती हैं। कई बार तो यह जासूस उन पर नजर रखने के चक्कर में दूसरे सर्कस तक 'झांक' आते हैं....
अगर कोई नई मुर्गी, कबूतरी या मोरनी सर्कस में भर्ती हो जाए तब तो कहने ही क्या। चूहे, गीदड़, भालू, सियार से लेकर सीनियर, जूनियर रिंग मास्टर तक वह सभी के आकर्षण का केंद्र बन जाती है। कोई उसकी 'चाल' पर नजर रखता है। कोई उसकी 'ढाल' पर। कोई उसके हुनर की बात करता है। तो कोई बेवजह तारीफ कर उसके नजदीक पहुंचना चाहता है। वह कहां रहती हैं। किसके साथ रहती है। कहां से आती है। कितने बजे आती है। कितने बजे जाती है। सर्कस में उसका शो कितने बजे है। सर्कस के 'स्मार्ट' कलाकारों को सब पता रहता है। वह पल-पल पर नजर रखते हैं। जैसे कोई शिकारी अपने 'शिकार' पर नजर रखता है।
सर्कस में नई मुर्गी, कबूतरी या मोरनी आने से पुरानी को परेशानी हो जाती है। वह फौरन पता करती है, नई मुर्गी कितने पानी में है। किस ओहदे पर आई है। पुराने सर्कस में कौन सा शो करती थी। कौन सा खेल दिखाती थी। यहां कौन सा हुनर दिखाएगी। कौन सा खेल करेगी। आदि-आदि। सब जानने के बाद पुरानी मुर्गी यह प्रचार करने में जुट जाती हैं कि उसके हुनर के सामने नई कुछ भी नहीं। उसकी अदा जितनी कातिल है, नई की कहां। उसकी चाल जितनी मदमस्त है, नई की कहां। वह जितनी खूबसूरत है, नई कहां। जितने फन उसे आते हैं, नई को कहां आते होंगे। उसे आता ही क्या है। जरूर सिफारिश से आई होगी। या फिर...पता नहीं 'कैसे' आई होगी।चूहे, गीदड़, सियार, भालू की अपनी ही दिक्कतें हैं। अपना खेल छोड़कर वह नई मुर्गी के पीछे पड़ जाते हैं। उनका एक ही काम होता है शिकारी की तरह नई चिड़िया फांसना। इसके लिए जरूरी है उसके बारे में सब कुछ जानना। वो यह तक पता लगा डालते हैं कि नई मुर्गी, मोरनी या फिर कबूतरी किस जंगल में पैदा हुई। कैसे किस सर्कस तक पहुंची। कैसे इस सर्कस तक पहुंची। कितने सर्कस का पानी पीकर आई है। कैसे आई है। कहां से आई है। कितनी पहुंच वाली है। कौन-कौन से हुनर जानती है। किसको-किसको पहचानती है। कौन उसका खास है। वह किसकी खास है। चूहे से लेकर गीदड़, सियार, भालू, चीता, शेर तक सभी की नजरें हर वक्त उसी को घूरती रहती हैं। बेचारी ! सर्कस के बोझ की मारी। चील, बाज, गिद्ध जैसे 'कलाकार' तो हर वक्त उस पर नजरें गड़ाए रहते हैं। कब मौका मिले और झपट पड़ें। वैसे मुर्गी, मोरनी, कबूतरी सब उनके इन खतरनाक इरादों से वाकिफ रहती हैं। उन्हें हर वक्त चील, बाज औऱ गिद्ध से खुद को बचाए रखना पड़ता है। यही उनकी कला है। यही उनका हुनर है।
सर्कस में हर कोई कोशिशों में लगा रहता है। आखिरी वक्त तक। उम्मीदें हर वक्त कायम रहती हैं। चूहे, गीदड़, सियार, शेर, चीता, भालू, चील, बाज, गिद्ध सब भिड़े रहते हैं। पता नहीं कब किसका तीर निशाने पर लग जाए। मुर्गी फंस जाए। मुर्गी भी इस बात को अच्छी तरह समझती है। कई बार वह दिखावे के लिए फंस जाने का नाटक भी करती है। कई बार वाकई फंस जाती है। कभी मर्जी से। कभी धोखे से। कभी मजबूरीवश।
सर्कस में नई मुर्गी औऱ मोरनी के आते ही पुरानी की कीमत कम हो जाती है। चूहे से लेकर चीफ तक के लिए उसका हुनर पुराना हो जाता है। कल तक उसकी तारीफों के पुल बांधे जाते थे। अब सबको उसके फन में खामियां नजर आने लगती हैं। पुरानी मोरनी की चाल भी अच्छी नहीं लगती और ढाल भी। तब पुरानी मुर्गी पहले से ज्यादा लीपना-पोतना शुरू कर देती है। ज्यादा स्टाइल मारना शुरू कर देती है। उसे गुस्सा भी ज्यादा आने लगता है। जरा-जरा सी बात पर। वह हर बात पर अपने जूनियर कलाकारों पर भड़कने लगती है। चिल्लाने लगती है। यही हकीकत है।
एक न एक दिन सर्कस के हर कलाकार को इस कड़वी हकीकत का एहसास होता है। तब वह अपने सर्कस को छोड़कर किसी दूसरे सर्कस का रुख कर लेता है। कभी फायदे के लिए। कभी मजबूरीवश। एक सर्कस से दूसरे-तीसरे-चौथे सर्कस जाने के फंडे पर नए कलाकार ज्यादा यकीन रखते हैं। जब तब इधर-उधर ट्राई मारते रहते हैं। मौका मिलते ही उड़ लेते हैं। नए सर्कस के नए-नए खेलों का हिस्सा बन जाते हैं। इससे उनका रुतबा बढ़ जाता है। वह बड़े कलाकार बन जाते हैं। जूनियर-सीनियर रिंग मास्टर बन जाते हैं। रातों रात। नया सर्कस नया ओहदा। सब कुछ बदला-बदला। नए से अलग पुराने से जुदा। (जारी...)
10 comments:
वाह भई क्या खाका खींचा है। वाकई में पढ़कर आनंद आ गया।
नया सर्कस नई मुर्गी..वाह जनाब आप तो छा गए. बहुत सही लिखा है। अगली कड़ी का इंतजार रहेगा।
अगली कड़ी का इंतजार....
रवींद्र जी न्यूजरूम का सर्कस रंग पकड़ रहा है। शुरू में ये कुछ भड़ास निकालने जैसी चीज लगी थी, लेकिन अब लग रहा है कि आप पूरी संजीदगी से लिख रहे हैं। सबसे बड़ी कामयाबी ये है कि एक एपीसोड पढ़ने के बाद ललक जगती है कि कब दूसरा मिल जाए। अब सातवें की ललक जग रही है। आप लिखते अच्छा हैं। भाषा अच्छी है। भाषा में धार है और उसकी मारक क्षमता बेहतरीन है। नई मुर्गी, पुरानी मुर्गी का द्वंद्व असली है। लेकिन मुर्गियों, कबूतरियों पर चील, बाज, गिद्ध के संभावित हमलों में कुछ अतिरेक है। दो शेर लिख रहा हूं, गौर कीजिएगा।
सभी मुझसे ही कहते हैं कि रख नीची नजर अपनी।
कोई उनसे नहीं कहता न यूं निकलें अयां होकर
(अयां मतलब-बन संवरकर)
फिर खरीदार निगाहों से शिकायत कैसी।
तुम भी तो हुस्न सजाए हो दुकानों की तरह।
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आप लिखते जाइए, हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं। उम्मीद है कि जब ये सीरीज पूरी होगी तो एक बेहतरीन व्यंग्य उपन्यास तैयार होगा।
विश्वबंधु जी हौसला बढ़ाने के लिए बहुत शुक्रिया। कोशिश करूंगा उम्मीदों पर खरा उतरने की।
रविंद्रजी, मीडिया का ये सर्कस अब आगे बढ़कर जिंदगी का एक हिस्सा बनता जा रहा है... जिंदगी के सर्कस की तरह हर इमोशन है आपके सर्कस... जगह बदलने की तड़प... आकर्षण, ईर्ष्या और प्रतिस्पर्द्धा... अच्छा है... अब जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ रही है आपकी जिम्मेदारी भी बढ़ती जा रही है.. सर्कस में काम करने वाले हर शख्स की उमड़ घुमड़ को अभिव्यक्त करने के साथ ही उस सीमा का भी खयाल रखना होगा... जहां से सर्कस में हादसे शुरू हो जाते हैं... खैर! अब कुछ टिप्पणी सर्कस के जोकरों पर भी होनी चाहिए... जोकरों की कोई दमदार इंट्री अभी तक नहीं हुई है... उनकी भी तो अपनी जगह है... आखिर मसखरों के बिना सर्कस पूरा कैसे होगा?
पशुपति जी, शुक्रिया। बस थोड़ा सा धैर्य रखें। अभी तो बहुत से कलाकार आने बाकी हैं। बस पढ़ते रहिए और अपने अमूल्य सुझावों से अवगत कराते रहिए। आपके सुझाव कहानी को आगे बढ़ाने में काफी अहम होंगे। बस जल्द ही जोकर को शो भी होने वाला है...मिलते हैं ब्रेक के बाद।
अच्छा लग रहा है आपका यह सर्कस। काफी बेबाकी से सच को उकेरा है आपकी लेखनी ने। यह लेखनी इसी तरह जारी रहनी चाहिये। इंतजार कर रहा हूं अगली कड़ी का........
मैं आपके ही सर्कस का एक कलाकार हूं। आप तो गजब का लिखते हैं। कहां छिपा रखी थी आपने यह प्रतिभा? सर्कस के सभी खिलाड़ियों को लाजवाब कर दिया है आपकी इस शानदार लेखनी ने।
बहुत बाड़िया... वाकई मे पड़कर आनंद आगय. आप कॉन्सी टूल यूज़ करते हे ?रीसेंट्ली मे यूज़र फ्रेंड्ली टूल केलिए डुंड रहा ता और मूज़े मिला "क्विलपॅड".....आप भी इसीका इस्तीमाल करते हे...?
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