दोस्तों, मुझे नहीं मालूम की इस आरती का लेखक कौन है। यह आरती मुझे ईमेल से मिली। जिसने भी इसे लिखा है वह बधाई का पात्र है। यह रचना दूसरों तक भी पहुंचे, इसीलिये इसे मैं साभार यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। पढ़िये और टिप्पणी कर उस अनाम लेखक का उत्साहवर्धन कीजिये।
बाल किशन जी अनाम लेखक को भी साधुवाद दे दीजिये। महेंद्र जी गूगल पुराण उपलब्ध कराने की कोशिश करूंगा, तब तक आरती से ही काम चलायें। राज जी, आरती दो बार करनी है सुबह और शाम। गंगा जल मॉनीटर पर नहीं सीपीयू में डालना है वह भी अंदर...हा हा हा। शुक्रिया दोस्तों।
भटकता हूँ अक्सर विषय की तलाश में,
सोचता हूँ लिखूं कुछ खास अंदाज़ में,
विधाओं की जोड़ दूं कुछ अनजुडी लडियां,
लेकिन जुड़ नहीं पातीं आपस में सब कड़ियाँ,
करता हूँ बार-बार कविता का छंदों से श्रृंगार,
टूट जातीं हैं, समेटता हूँ, संभालता हूँ हर बार,
कुछ लिखूं, जो हो अब तक से बेहतर,
औरों से कुछ…हटकर।
सीखना चाहता हूँ दर्द सहना, चुप रहना.
वक्त की ऊंची-नीची राहों पर,
जो साबित ना हो जाये बौना,
चाहूँगा कुछ ऐसा कहना.
-रवींद्र रंजन +919910908854
5 comments:
हा! हा! हा!
सुंदर आरती है.
प्रस्तुत करने के लिए आपको साधुवाद.
गूगल आरती बढ़िया. लगी हो सके तो गूगल पुरान भी उपलब्ध कराए , आपके साथ साथ अनाम रचनाकार को बधाई
भाई यह तो लिखा नही ,दिन मे आरती कितनी बार करनी,ओर गंगा जल सीधा मोनिटोर पर डलना हे या पी सी पर.अनाम महाराज ओर आप को प्र्णाम
बाल किशन जी अनाम लेखक को भी साधुवाद दे दीजिये। महेंद्र जी गूगल पुराण उपलब्ध कराने की कोशिश करूंगा, तब तक आरती से ही काम चलायें। राज जी, आरती दो बार करनी है सुबह और शाम। गंगा जल मॉनीटर पर नहीं सीपीयू में डालना है वह भी अंदर...हा हा हा। शुक्रिया दोस्तों।
):
एक टिप्पणी भेजें