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जो आने वाले हैं दिन उन्हें शुमार में रख...

सोमवार, ३१ दिसम्बर २००७



देखते ही देखते एक साल और गुजर गया. अगर मुश्किल में गुजरें तो एक-एक पल गुजारना मुश्किल होता है. यहां तो 365 दिन गुजर गये. सोचकर अजीब लगता है. ये दिन, महीने, साल कैसे गुजर जाते हैं. इसी का नाम तो जिंदगी है. जिंदगी का कोई लम्हा बहुत ही खुशगवार बन जाता है. कोई लम्हा यादगार बन जाता है तो कोई कभी न भूलने वाला डरावना सपना भी. जो गुजर गया वो गुजर गया. जो याद रखने लायक नहीं है उसे भूल जाना ही ठीक है. खैर मैं तो उन बातो का जिक्र करना चाहूंगा जिन्हें मैं हमेशा याद रखना चाहूंगा. पाना-खोना तो लगा ही रहता है. इस साल मैंने भी बहुत कुछ पाया. इसी साल मैं आरकुट से भी रूबरू हुआ। इसके जरिये वाकई मुझे अपने कई पुराने दोस्त मिल गये। बिछड़े दोस्तों को मिलाने वाली ये वेबसाइट वाकई में कमाल की है. इसी साल मैंने ब्लागिंग की दुनिया में भी प्रवेश किया. ये दुनिया वाकई में बहुत बड़ी और निराली है. सबसे बड़ी बात है कि इसकी वजह से मेरा लिखना फिर से शुरू हो गया. देश-विदेश में फैले हिंदी लेखकों को देख-पढ़कर बेहद सुखद अनुभूति हुई. हालांकि शुरू में कुछ परेशानी भी हुई. मुझे नाहक ही किसी दूसरे का आयडिया कॉपी करने का आरोप झेलना पड़ा। लेकिन मैं आपने उन ब्लागर साथियों का शुक्रगुजार हूं जिन्होंने मुझे समझा और मुझे बल दिया. मेरा साथ दिया. मेरे कुछ दोस्तों को तो ब्लागिंग के बाद ही मालूम हुआ कि मैं भी लिखने का शौक रखता हूं. ऐसी कई पुरानी रचनायें जो न तो छप सकी थीं और न ही मैं उन्हें कहीं प्राकाशनार्थ प्रेषित कर सका था उन्हें भी मैं अपने ब्लाग पर पेश कर सका। शायद इसलिये क्योंकि ऐसा करने के लिये मुझे किसी संपादक की अनुमति लेने की जरूरत नहीं थी. साल भर की बातें हैं लिखने में वक्त भी लगेगा और जगह भी. लिहाजा टुकड़े-टुकड़े में मैं लिखने की कोशिश करता रहूंगा. फिलहाल आप सबको नये साल की हार्दिक शुभकामनायें. (क्रमश:)

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