गुरुवार, 28 जून, 2007

वो चार आंखें

अति विकसित से प्रतीत होने वाले
आधुनिक लोगों के शहर में
चलते-फिरते लोगों से व्यस्त
एक सड़क पर
बढ़े जा रहे थे छः कदम
दो तेज़ से
चार शिथिल से
दो कदम थे आगे
चार पीछे
दो आंखें थीं चमकती हुईं
जो देखतीं थीं ऊंचे
और जो झुकी जा रही थीं नीचे
वो चार आंखें थीं पथराई सी
उन दो आंखों को
वो चार आँखें
लग रही थीं पराई सी
कुछ साथ निराशा थी लेकिन
कुछ आशा भी थे साथ लिए
बढ़े जा रहे थे चार कदम
उन दो क़दमों को साथ किये
एक अनजानी मंजिल पर आ
थम गए अचानक सभी क़दम
लेकिन वह तो आश्रम था
हाँ आश्रम!
संभवतः वो ही मंजिल थी
लेकिन...
सिर्फ शिथिल से बढ रहे
उन चार क़दमों की
अपनी मंज़िल से अनजान
पथराई से उन चार आंखों की
क्योंकि...
बाक़ी के दो तेज़ कदम तो
अब तक मुड गए थे वापस
उन चार क़दमों को वहां
अन्जानों के बीच छोड़कर
सदा के लिए मुँह मोड़कर।(1996)