सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ें- एक दो तीन चार पांच छह सात आठ नौ
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सर्कस में लंगूरों की भी अच्छी तादाद है। लंगूर अकेले नहीं रहते। टोलियों में रहते हैं। टोलियों में खेल दिखाते हैं। जंगल की तरह ही सर्कस में भी लंगूरों ने अपना-अपना इलाका बांट रखा है। एक लंगूर दूसरे के इलाके में दखल नहीं देता। अगर कोई ऐसा करने की हिमाकत करता है तो दूसरे लंगूर को यह कतई बर्दाश्त नहीं होता। इसी चक्कर में कई बार लंगूरों के बीच शीत युद्ध छिड़ जाता है।
वैसे लंगूरों के बीच शीत युद्ध तो हमेशा ही चलता रहता है। एक लंगूर दूसरे लंगूर को मात देने में जुटा रहता है। लगा रहता है। भिड़ा रहता है। दोनों तरफ से तरह-तरह की चालें चली जाती हैं। गोटियां बैठाई जाती हैं। कोई राजा को पटाता है तो कोई वजीर को। तो कोई मोहरों के जरिये ही विजेता बनने की कोशिश करता है। लंगूरों के इस खेल में पूरी तरह किसी की जीत नहीं होती। किसी की हार नहीं होती। कभी कोई भारी पड़ता है, कभी कोई। लेकिन शह और मात का यह खेल कभी खत्म नहीं होता। हर लंगूर की कोशिश होती है खुद को तीसमार खां साबित करने की।
चूहे-बिल्ली के बीच ही सही, अपनी सत्ता कायम करने के लिए लिए लंगूर क्या-क्या नहीं करता। हरदम परेशान रहता है। रात-रात भर जागता रहता है। इधर-उधर भागता रहता है। शांत तो वह बैठ ही नहीं सकता। अगर बैठा तो दूसरा लंगूर बाजी मार लेगा। यह 'डर' लंगूर को हर वक्त परेशान किए रहता है। जब वह शो की तैयारी कर रहा होता है तब भी। जब वह सर्कस से बाहर होता है तब भी।
लंगूरों का काम है सर्कस के बंदरों पर काबू रखना। चूहे, बिल्ली, गीदड़ जैसे छोटे-मोटे कलाकारों को वश में रखना। लंगूर इन छोटे-मोटे कलाकारों को कंट्रोल में रखने की पूरी कोशिश करते हैं।
इस बात का पूरा खयाल रखा जाता है कि कोई चूहा-बिल्ली चूं-चपड़ न करे। इसीलिए लंगूर कभी इन्हें आंख दिखाता है। कभी दांत दिखाता है। तो कभी पूंछ फटकार कर डराता है। बेचारे छोटे-मोटे कलाकर चुप रह जाते हैं। सब सह जाते हैं। मन मसोसकर। काफी कुछ सोचकर। कई बार छोटे-मोटे कलाकारों को भी गुस्सा आ जाता है। वह मुकाबले की मुद्रा में आ जाते हैं। तब लंगूर की बोलती बंद हो जाती है। वह दुम दबाने में ही भलाई समझता है। आखिर लंगूरों की भी अपनी सीमाएं हैं। सरहदें हैं जिन्हें वह लांघ नहीं सकते।
अलग-अलग सर्कस में लंगूरों की अलग-अलग तादाद होती है। जितना बड़ा सर्कस उतने ज्यादा लंगूर। ये लंगूर खुद को चीफ रिंग मास्टर से कम नहीं समझते। फर्क सिर्फ इतना है कि चीफ रिंग मास्टर पूरे सर्कस पर काबू रखता है। ये लंगूर सर्कस के कुछ कलाकारों पर। काबू में रखने के मामले में चीफ रिंग मास्टर लंगूरों का आदर्श है। लंगूर भी हर वक्त उसके जैसा बनने की कोशिश करते हैं। इस गफलत में कई बार उन्हें गलतफहमी भी हो जाती है। वह खुद को चीफ रिंग मास्टर समझ बैठते हैं।
यह सर्कस भी अजीब है। हर खिलाड़ी खुद को 'सबसे बड़ा खिलाड़ी' समझता है। जो लंगूर जितनी ज्यादा उछल-कूद करता है, चीफ रिंग मास्टर उसे उतना ही ज्यादा पसंद करता है। चीफ को लगता है कि वही सबसे ज्यादा एक्टिव है। वही सबसे ज्यादा होनहार है। वही सबसे बड़ा कलाकार है। इसीलिए कई बार लंगूर चीफ को देखते ही उछलना शुरू कर देता है। कूदना शुरू कर देता है। छोटे-मोटे कलाकारों पर खीं-खीं करना शुरू कर देता है। चीं-ची करना शुरू कर देता है। सर्कस में सब इस 'खेल' से वाकिफ हो चुके हैं। यकीनन चीफ चीफ रिंग मास्टर भी। चीफ सब जानता है, लेकिन जाहिर नहीं करता। लंगूरों में खुशफहमी बनी रहे तो हर्ज ही क्या है? इससे लंगूरों को हौसला मिलता है। हुनर दिखाने की प्रेरणा मिलती है। वैसे हुनर हो या ना हो, वह दिखना जरूर चाहिए। सर्कस में जो दिखता है वही बिकता है। यही हकीकत है। यही सर्कस है। (जारी...)
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19 घंटे पहले

