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मदेरणा हैं कि मानते नहीं

बुधवार, 7 दिसम्बर 2011



नेता बेशर्म होते हैं यह तो दुनिया जानती है। लेकिन राजस्थान पूर्व जल संसाधन मंत्री महिपाल मदेरणा ने बेशर्मी की सारी हदें तोड़ दी हैं। अब भी वही राग अलाप रहे हैं जो उन्होंने सियासत की पाठशाला के पहले दर्ज में पढ़ा था। कहते हैं उनके खिलाफ साजिश हुई है। उन्हें फंसाया गया है। वह संघर्ष करेंगे। इसे ही कहते हैं सब कुछ गंवाकर भी होश नहीं आया। याद कीजिए टेलिविजन पर दिखाई गईं वो तस्वीरें जिसमें सीबीआई मदेरणा को गिरफ्तार करके जोधपुर से दिल्ली ले जा रही थी। उसी वक्त मदेरणा ने मीडिया के सामने ये बेशर्मी भरा बयान दिया कि उन्हें फंसाया गया है। उनके चेहरे पर अपने किए का ना तो कोई अफसोस था और ना ही कोई शर्म-लिहाज। उल्टा मदेरणा साहब तो बेशर्मी की सारी हदें तोड़ने को बेकरार थे।


वैसे भी अब मदेरणा के पास शर्म करने लायक बचा क्या है? सीडी में कैद उनकी 'डर्टी पिक्चर' को दुनिया देख चुकी है। लेकिन मदेरणा हैं कि मानते नहीं। उन्हें अब भी अपनी सियासी विरासत बचाने की फिक्र खाए जा रही है। तभी तो पकड़े जाने पर जैसे हर सफेदपोश खुद को बेकसूर बताता है, अपने खिलाफ साजिश रचे जाने की बात करता है, वही सब अब महिपाल मदेरणा भी कर रहे थे। मदेरणा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं। पूर्व कैबिनेट मंत्री है। सियासत के पुराने खिलाड़ी हैं। जाहिर है, आसानी से हार नहीं मानेंगे।

अब जरा मदेरणा की स‌ाहिबजादी की भी थोड़ी चर्चा कर लें। मदेरणा की बेटी दिव्या मदेरणा अपने पिता स‌े कह रह थी कि टेंशन लेने की कोई बात नहीं है। उसका भी यही कहना था कि उसके पिता को फंसाया गया है। उनके पिता की राजनीतिक हत्या करने के लिए यह षड्यंत्र रचा गया है। राजनीति के अभिमन्यु की तरह उसके पिता इस चक्रव्यूह को तोड़ेंगे। दिव्या की बड़बोली बातें स‌ुनकर हमें तो एक ही कहावत याद आई...बड़े मियां तो बड़े मियां छोटे मियां सुभानअल्ला। सियासत के पुराने खिलाड़ी मदेरणा के मुंह स‌े तो राजनीति के रंग में लिपटे लफ्ज निकलने लाजिमी थे। लेकिन सियासत की एबीसीडी से दूर रही, मदेरणा की साहिबजादी दिव्या भी बाप की जुबान बोल रही थी। ऎसे जता रही थी जैसे उसके पिताश्री बिल्कुल दूध के धुले हैं। किसी ने उन्हें साजिश करके फंसा दिया और वो बेचारे फंस गए।

मदेरणा की बेटी तो काफी देर स‌े मीडिया के स‌ामने आई। उससे पहले उनकी पत्नी लीला मदेरणा ये बयान दे चुकी हैं कि स‌ीडी में होना कोई गुनाह थोड़े हैं। किसी तरह का सीडी बरामद होना या फिर किसी से रिश्ते रखना अपराध नहीं है। लीला ने ये भी कहा था कि ये तो चलता है। राजा-महाराजाओं के वक्त स‌े चला आ रहा है। लीला मैडम की लीला तो वाकई में अपरम्पार है। उन्हें सारी दुनिया विलेन और अपना पति हीरो नजर आता है। पति की असलियत देखकर भी दिखाई नहीं देती। या शायद वह देखना नहीं चाहतीं।

एक बात पर और भी गौर करने लायक है। बाप और मां-बेटी जब भी मीडिया के स‌ामने आईं उनके चेहरे पर अफसोस, रंज या गम की नन्ही स‌ी लकीर भी नजर नहीं आई। मतलब साफ है राजस्थान के मदेरणा ने भी जो किया, अब उसकी बेटी और बीवी मिलकर उस पर लीपापोती करने में जुट गई हैं। बेटी तो मां से भी दो कदम आगे है। उसने अपनी तुलना बेनजीर भुट्टो स‌े कर डाली है। दिव्या मदेरणा का कहना था कि जिस तरह बेनजीर ने पिता की विरासत स‌ंभाली थी उसी तरह वह भी पिता की राजनीतिक विरासत को स‌ंभालेगी। अब अगर अगले चुनावों में मदेरणा की साहिबजादी दिव्या अपने लिए वोट मांगती नजर आ जाएं तो आपको कोई अचरज नहीं होना चाहिए।

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द ग्रेट स‌र्कस ऑफ न्यूजरूम 16

रविवार, 21 नवम्बर 2010

सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ेंएक दो तीन चार पांच छहसात आठ नौ दस‌ ग्यारह बारह तेरह चौदह

स‌र्कस में कौवे और उल्लू भी हैं। लेकिन चितकबरे कबूतर के तो कहने ही क्या। वह पूरे स‌र्कस में एक ही है। इकलौता। अनोखा। अनजाना। चितकबरापन भी उसे कुदरत स‌े नहीं मिला। उसने खुद हासिल किया है। अपनी काबिलियत के बलबूते। शायद कभी वो दूसरे कबूतर-कबूतरियों की तरह स‌ाफ-सुथरा हुआ करता था। स‌फेद, चमकदार और चिकना। वक्त के स‌ाथ-साथ उसका रंग बदलता गया। पहले वह स्याह हुआ। फिर काला। और फिर शरीर में जगह-जगह चित्तियां पड़ने लगीं। इस तरह वह चितकबरा कबूतर बन गया। बाकी कबूतरों और कबूतरियों स‌े अलग। स‌बस‌े जुदा।

अलग के स‌ाथ-साथ खास नजर आना भी जरूरी है। लिहाजा चीफ ने उसे खास बना दिया। चीफ का खास वो पहले स‌े था। अब कबूतर-कबूतरियों में भी खास बन गया। देखने में भारी-भरकम और चित्तीदार। दूसरे स‌र्कस के कबूतर-कबूतरियों को तो कई बार धोखा हो जाता है। वह उसे कोई और जानवर स‌मझ बैठते हैं। उन्हें लगता कि ये तो हमारे बीच का नहीं है। किसी और प्रजाति का है। मोटा। बेडौल। बेढंगा। लेकिन गौर स‌े देखने पर पता चलता कि वह भी कबूतर ही है। बदला हुआ कबूतर। उस‌के शरीर में मौजूद चित्तियां उसके 'अलग' व्यक्तित्व का एहसास कराती हैं। चीफ का खास होने के हुनर ने उसे स‌र्कस में भी खास बना दिया है। 

कहते हैं कभी वह भी 'उड़ा' करता था। अब उड़ भी नहीं पाता। स‌िर्फ पंख फड़फड़ाता है। चोंच चलाता है। फिर भी खास है। दूसरे कबूतर-कबूतरियां वाकई में उड़ते हैं। जगह-जगह घूमते हैं। फिरते हैं। धक्के खाते हैं। तब कहीं जाकर स‌र्कस के शो के लिए कुछ माल इकट्ठा हो पाता है। लेकिन चितकबरा कबूतर बिना उड़े ही माल इकट्ठा कर लेता है। कभी उड़ने का दिखावा करके। कभी दूसरे कबूतर-कबूतरियों की मेहनत पर डाका डालकर। उनके काम को अपना बताकर। हड़पकर। वह स‌ीना ठोककर ऎसा करता है। चीफ ने उसे ऎसा करने का हक दिया है। शायद। वो कबूतर-कबूतरियों का चीफ है। चीफ के मुताबिक। इसलिए वह स‌िर्फ रौब जमाता है। चीफ की तरह। ऑर्डर झाड़ता है। हर वक्त। बेवक्त। 

चितकबरा कबूतर कुछ और कर भी नहीं स‌कता। किसी शो के लिए जरूरी स‌ामान नहीं जुटा स‌कता। स‌र्कस स‌े बाहर निकलता है तो उसे कोई जानता नहीं। पहचानता ही नहीं। खुद अपना परिचय देता है तो दूसरे स‌र्कस के कबूतर-कबूतरियां उसका मजाक बनाते हैं। उसके बेडौल शरीर को लेकर टिप्पणियां करते हैं। हंसते हैं। ठहाके लगाते हैं। कोई उसे गिद्ध कहकर चिड़ाता है। कोई उल्लू बताता है। कोई उसके जंगल स‌े स‌र्कस तक पहुंचने की कहानियां स‌ुनाता है। उस‌की असलियत को बेपर्दा करने की हिमाकत करता है। लेकिन कलाकार तो वह फिर भी रहता है। वरिष्ठ कलाकार। सुपर स‌ीनियर कबूतर। दूसरे कबूतर-कबूतरियां उसे स‌ंक्षिप्त में 'स‌ीके' कहते हैं। कुछ स‌िर्फ 'स‌ी' कहकर भी काम चला लेते हैं। 

छोटे कबूतर-कबूतरियां दिन भर मेहनत करते हैं। कमाते हैं। वह खाता है। मुफ्त का माल उड़ाता है। तभी उसका शरीर बेडौल, बेढंगा और अजीब हो गया है। वह उसे स‌ही आकार देने की लाख कोशिश करता है। मगर फिर भी किसी भी दृष्टि स‌े कबूतर नजर नहीं आता। बाज औऱ चील का नजदीकी रिश्तेदार लगता है। उनकी प्रजाति का प्रतीत होता है। उसके शरीर पर मौजूद चित्तियां भी स‌बको ऎसा स‌ोचने पर मजबूर कर देती हैं। उसका ये चितकबरापन शायद चीफ को बहुत पसंद है। तभी तो वह उसे हर वक्त अपने स‌ाथ लेकर घूमता है। हर बात में उसका बचाव करता है। पक्ष लेता है। हुनरमंद बताता है। हकीकत छिपाता है। 

दूसरे कबूतर-कबूतरियां स‌र्कस छोड़कर चले जाएं ये चीफ को मंजूर है। लेकिन चितकबरे कबूतर को कुछ नहीं होना चाहिए। उसे कहीं नहीं जाना चाहिए। वह लाखों में एक है। चीफ की नजर में। हीरा है। स‌दा के लिए। लेकिन बाकी स‌बकी नजरों में वो स‌िर्फ पत्थर है। काला पत्थर। यह स‌ब जानते हैं। स‌ब मानते हैं। चीफ भी जानता है। लेकिन मानता नहीं। चितकबरा प्रेम उसे सच को झुठलाने पर विवश कर देता है। पता नहीं चीफ को उसकी कौन स‌ी 'प्रतिभा' प्रभावित करती है। यह एक राज है। स‌र्कस में स‌ब इसी स‌वाल का जवाब ढूंढ रहे हैं। खासकर वो कबूतर और कबूतरियां जो चितकबरे की हरकतों स‌े परेशान हैं। आजिज हैं। चितकबरे कबूतर को उनके स‌िर पर लाकर बैठा दिया गया है। ढोने के लिए। 

कई कबूतर-कबूतरियां तो चितकबरे स‌े परेशान होकर भाग खड़े हुए। स‌र्कस को छोड़कर। स‌दा के लिए मुहं मोड़कर। लेकिन चीफ को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह दूसरे स‌र्कस स‌े नए कबूतर-कबूतरियां ले आता है। यूं तो स‌र्कस की दुनिया में कबूतर-कबूतरी बहुत मिलते हैं। नए- पुराने। जाने-अनजाने। महंगे-सस्ते। लेकिन चितकबरा कबूतर आसानी स‌े नहीं मिलता। उसकी खासियतें चीफ को प्रभावित करती हैं। लेकिन वो 'खासियतें' क्या हैं? ये कोई अब तक नहीं जान पाया। जो जान गया उसे स‌र्कस स‌े चलता कर दिया गया। या फिर खामोश रहने की ताकीद कर दी गई। 

इस तरह चितकबरे कबूतर का राज अब तक राज ही बना हुआ है। स‌र्कस में ऎसा ही होता है। जो ठीक स‌े उड़ तक नहीं पाता उसे कबूतर-कबूतरियों का चीफ बना दिया जाता है। जो ठीक स‌े व्यक्त नहीं कर पाता वो स‌ूत्रधार बन जाता है। अचानक। कभी भी। रातोंरात। यही हकीकत है। यही सर्कस है। (जारी...)

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द ग्रेट स‌र्कस आफ न्यूजरूम 15

शनिवार, 6 नवम्बर 2010

सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ेंएक दो तीन चार पांच छहसात आठ नौ दस‌ ग्यारह बारह तेरह चौदह

कबूतरी फिर अपने पुराने स‌र्कस में लौट आई है। पहले स‌े बहुत बदल गई है। बरसों पहले वह इसी स‌र्कस का हिस्सा होती थी। चीफ रिंग मास्टर की नजर में वह काफी हुनरमंद है। आज भी और कल भी। इसीलिए चीफ ने उसे पहले ही सर्कस का स‌ूत्रधार बना दिया था। तब स‌े ही स‌र्कस में उस‌े चीफ का काफी करीबी माना जाता है। बहुत चालक है ये कबूतरी। इधर का उधर करने के मामले में तो जोकर स‌े कम नहीं है। अपने फायदे के लिए 'कुछ भी' कर स‌कती है। करती भी है। इस कबूतरी ने स‌र्कस में बड़ी तेजी स‌े कामयाबी की स‌ीढ़ियां चढ़ी हैं। कल तक स‌र्कस की मामूली स‌ी कलाकार थी। आज स्टार है। स‌ूत्रधार है।

कबूतरी दोबारा इस स‌र्कस में आई है। लिहाजा रूतबा कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। पुराने दिन शायद भूल गई होगी। बुरे दिनों को भला याद भी कौन रखना चहता है? वो भी क्या दिन थे। तब कबूतरी स‌र्कस में नई-नई आई थी। स‌र्कस भी नया था। कबूतरी को खूब डांट खानी पड़ती थी। चीफ की खास होने के बावजूद। कभी उस पर स‌ीनियर रिंग मास्टर चीखता था। कभी हेड रिंग मास्टर। गाहे-बगाहे चूहे भी आंख दिखा देते थे। चीफ बेचारा चुपचाप देखता रहता था। बर्दाश्त करता रहता था। चीफ को बहुत बुरा लगता था। कबूतरी का डांट खाना नागवार गुजरता था।



चीफ मन मसोस कर रह जाता था। लेकिन कुछ नहीं बोलता था। वह मौके का इंतजार करता था। मौका पाते ही स‌ीनियर रिंग मास्टरों और चूहों की जमकर क्लास लेता था। किसी न किसी बहाने उन्हें जलील करता था। चीफ के बदला लेने का यही स्टाइल है। जिसस‌े बदला लेना होता है चीफ उसके काम में खामियां निकालना शुरू कर देता है। चीफ की नजर में उसका शो भी बेकार हो जाता है और उसका हुनर भी। 'कबूतरी फैक्टर' है ही ऎस‌ा। चीफ भी 'नाचने' लगता है। कबूतरी के इशारों पर। कबूतरी भी अपने 'हुनर' का खूब इस्तेमाल करती है। अपने दुश्मनों को ठिकाने लगाने के लिए उसके पास कई 'अचूक' हथियार हैं। एक निशाना चूक जाए तो दूसरा। दूसरा निशाने पर न लगे तो तीस‌रा। उस‌के बाद चौथा, पांचवां और ना जाने 'कौन-कौन स‌ा'।

कबूतरी पूरे तीन स‌ाल बाद लौटी है। इस दौरान कहां रही? क्या-क्या किया? कौन-कौन स‌ा हुनर दिखाया? कोई नहीं जानता। जानता है तो स‌िर्फ चीफ रिंग मास्टर। वही तो उसे दोबारा स‌र्कस में लेकर आया है। स्टार स‌ूत्रधार बनाकर। स‌ुनते हैं बीच में कबूतरी ने एक और स‌र्कस ज्वाइन किया था। लेकिन वहां उसकी 'चल' नहीं पाई। मजबूरन स‌ब कुछ छोड़कर घर बैठ गई। तीन स‌ाल बाद फिर उसकी प्रतिभा ने जोर मारा। जब अंदर घुसी उसकी  प्रतिभा बाहर निकलने को ज्यादा ही बेताब हो गई, तो वह लौट आई। अपने पुराने स‌र्कस में। वैसे यहां के रास्ते उसके लिए हमेशा स‌े खुले थे। चीफ का प्रिय और खास होने का यही फायदा है।

कबूतरी वापस लौटी तो स‌र्कस में उसकी पुरानी स‌हेली लोमड़ी ने उसका जोरदार स्वागत किया। हालांकि लोमड़ी का चेहरा कुछ और ही कह रहा था। हाव-भाव बता रहे थे कि वह खुश नहीं है। बातों-बातों में लोमड़ी ने जता भी दिया। यही कि अब वह स‌र्कस की स‌ीनियर लोमड़ी हो गई है। लोमड़ी ने मन ही मन स‌ोचा। तीन स‌ाल घर बैठने स‌े कबूतरी पीछे रह गई है। अब स‌ूत्रधार बनकर आई है तो क्या हो गया? स‌र्कस में स‌िक्का तो लोमड़ी का ही चलेगा। हाथी स‌े लेकर गैंड़े तक उसकी जान-पहचान जो है। देखते हैं कबूतरी कब तक टिकती है। लोमड़ी ने मुस्कराते हुए कबूतरी की तरफ देखा और बिजी होने का दिखावा करती हुई रिंग की तरफ बढ़ गई।

कबूतरी और लोमड़ी में एक स‌मानता है। दोनों खुद को चीफ रिंग मास्टर का बेहद करीबी स‌मझती हैं। स‌र्कस स‌े लेकर घर तक। उनके चीफ स‌े घरेलू ताल्लुकात हैं। अक्सर परिवार स‌मेत आना-जाना लगा रहता है। कबूतरी ने दोबारा स‌र्कस में आकर अपने स‌ंबंधों को स‌ाबित भी कर दिया। अब बारी है लोमड़ी की।

अस‌ल में लोमड़ी ईर्ष्या की शिकार है। उसे पता है। कबूतरी उससे ज्यादा खूबस‌ूरत है। स्मार्ट है। वाचाल है। खूबस‌ूरती के बल पर वह जल्द ही स‌र्कस में राज करने लगेगी। यही डर लोमड़ी को परेशान कर रहा है। इसीलिए लोमड़ी कल स‌े खूब फेयर एंड लवली लगाने लगी है। मेकअप करने लगी है। दोबारा अजीब-अजीब स‌े कपड़े भी पहनने लगी है। ताकि सर्कस में स‌ब लोग उसे ही निहारें। स्वीकारें। और कबूतरी का आकर्षण कुछ कम पड़ जाए।

दो पुरानी स‌हेलियों के बीच ऎस‌ी जलन, ऎसी ईर्ष्या होना लाजिमी है। कंपटीशन का जमाना है। लेकिन लोमड़ी कितना भी मेकअप करे कितनी भी फेयर एंड लवली लगाए, कबूतरी जैसी नहीं निखर स‌कती। लोमड़ी का थूथन स‌ारा काम बिगाड़ देता है। उसकी  खूबसूरत के रास्ते पर ब्रेकर बन कर खड़ा हो जाता है। लोमड़ी मन मसोस कर रह जाती है। कभी भगवान स‌े शिकायत करती है। कभी अपनी किस्मत को कोसती है। फिर भी हार नहीं मानती। लोमड़ी को कौन स‌मझाए? वह जानकर भी नहीं मानती कि कबूतरी की बात ही कुछ और है। सर्कस में ऎसा स‌ब कहते हैं। चीफ रिंग मास्टर भी ऎस‌ा ही कहता है। और चीफ ने कह दिया तो यही स‌च है। यही स‌र्कस है। (जारी...)

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द ग्रेट स‌र्कस ऑफ न्यूजरूम 14

सोमवार, 1 नवम्बर 2010

सर्कस की पिछली कड़ियां पढ़ेंएक दो तीन चार पांच छहसात आठ नौ दस‌ ग्यारह बारह तेरह
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स‌र्कस का जोकर रोज की तरह अजीब-अजीब हरकतें कर रहा है। शुक्र है आज चीफ रिंग मास्टर नहीं है। चीफ होता है तो जोकर की हरकतें बढ़ जाती हैं। चीफ को झेलना आसान है। जोकर को झेलना मुश्किल है। जोकर हमेशा स‌े खुद को स्मार्ट कलाकार स‌मझता आया है। उसकी स्मार्टनेस के कई किस्से मशहूर हैं। जहां भी रहा किस्सों का किरदार बन गया।


वैस‌े किस्सा स‌ुनाना जोकर को भी बहुत पसंद है। हर वक्त कोई न कोई किस्सा उसकी जुबान पर रहता है। पात्र बदलते रहते हैं। कहानी बदलती रहती है। वह नहीं बदलता। कभी लोमड़ी के किस्से को नमक मिर्च लगाकर बयां करता है। कभी मुर्गियों और स‌ियार के बीच 'विकसित' होने वाली कथा को रस ले लेकर बांचने लगता है।


जोकर को गलतफहमी है। उसे लगता है स‌ब उसे बहुत पसंद करते हैं। मानते हैं। जानते हैं। जोकर को लगता है कि इधर स‌े उधर करने की उसकी 'खासियत' स‌े बड़े कलाकार उससे खुश रहते हैं। जोकर का पब्लिक रिलेशन गजब का है। खासकर स‌ीनियर रिंग मास्टर स‌े उसकी खूब छनती है। वह रोज उसे दिन भर की रिपोर्ट मुहैया कराता है। इससे स‌ीनियर रिंग मास्टर खुश रहता है। उसे भी लगता है कि वो स‌र्कस के बारे में सब जानता है। सभी कलाकारों की असलियत पहचानता है।


जोकर कभी एक जगह नहीं बैठता। यहां-वहां घूमता रहता है। ताक-झांक करता रहता है। एक जगह बैठकर काम करने में उसका मन नहीं लगता है। एक जगह बैठने पर उसके पीआर पर भी फर्क पड़ता है। इसलिए वह पूरे न्यूजरूम में नाचता रहता है। मोर की तरह नहीं। भालू की तरह। जोकर स‌ीनियर कलाकरों और स‌ीनियर रिंग मास्टर को स‌लाम बजाता रहता है। उसे लगता है कि ऎसा करके उसका पीआर बढ़ रहा है। वह लोकप्रिय हो रहा है। उसके रुतबे में इजाफा हो रहा है।


लोकप्रिय होना जोकर का पुराना ख्वाब है। वह बताता है कि स‌र्कस के बाहर उसकी बहुत जान-पहचान है। बड़े-बड़े कलाकार उसे जानते हैं। दूसरे स‌र्कस के चीफ रिंग मास्टर तक उसे पहचानते हैं। उसका नाम जानते हैं। उसकी बड़ी-बड़ी बातें स‌ुनकर नए-नए चूहे और इक्का-दु्क्का बिल्लियां उसकी बातों में आ जाती हैं। उस पर यकीन कर लेती हैं। इससे जोकर फूला नहीं स‌माता। उसे लगता है कि स‌र्कस में उसकी स्वीकार्यता बढ़ रही है। पीआर में दिनोंदिन इजाफा हो रहा है।


जोकर हर वक्त चीफ रिंग मास्टर तक पहुंचने की कोशिश करता रहता है। चीफ का चमचा बनना उसका अधूरा स‌पना है। वैसे इस ओहदे के लिए वह बिल्कुल परफेक्ट है। चीफ को इधर की उधर करने वाले और रिंग की हर खबर देने वाले 'कलाकार' बहुत पसंद हैं। वह हर वक्त ऎस‌े होनहार कलाकारों की तलाश में रहता है। स‌मय-स‌मय पर स‌र्कस में 'टैलेंट हंट' भी करवाता रहता है। इसीलिए जोकर चीफ का चमचा बनना चाहता है। उसे हर तरह की खबरें देकर उसके करीब आना चाहता है। वह जानता है। चीफ का करीबी होना फायदेमंद है। इससे स‌र्कस में उसका रुतबा बढ़ जाएगा। स‌ब उसस‌े डरने लगेंगे। पता नहीं कब कौन स‌ी खबर चीफ तक पहुंचा दे। तब कोई उससे स‌वाल नहीं करेगा। ये नहीं पूछेगा कि उसने आज क्या किया? किसी की यह पूछने की हिम्मत नहीं होगी कि उसका शो तैयार है या नहीं?


जोकर स‌र्कस का खबरिया है। उसके पास हर तरह की खबर होती है। यह उसका दावा भी है। वह दावे बहुत करता है। वो भी बड़े-बड़े। जबरन कहानी स‌ुनाना और स‌र्कस के दूसरे कलाकारों को बोर करना उसका प्रिय शगल है। सब उसकी बात स‌ुनते हैं। कुछ स‌ुनने का दिखावा करते हैं। जोकर की अनदेखी कर पाना मुश्किल है। खतरनाक भी। क्योंकि उसकी जेब में नमक और मिर्च भारी तादाद में रहता है। जिसे लगा-लगाकर वो खबरों को मसालेदार बनाता रहता है। चाट की तरह चमकाता रहता है। उसकी 'चाट' स‌े स‌ब डरते हैं। 'बड़ा' हो या छोटा। पतला हो या 'मोटा'। लोमड़ी हो या बिल्ली। चूहा हो या शेर। या फिर स‌ियार हो या गीदड़।


स‌र्कस में जोकरों की कमी नहीं है। कुछ शौक स‌े जोकर बनते हैं। कुछ वक्त के स‌ाथ-स‌ाथ जोकर के स‌ांचे में ढल जाते हैं। जाने-अनजाने। कुछ पैदायशी जोकर होते हैं। स‌र्कस में दूसरी प्रजाति के जोकरों की तादाद ज्यादा है। ये वो फनकार हैं जो वक्त के स‌ाथ-साथ जोकर के स‌ांचे में ढल गए। जरूरत स‌ब कुछ स‌िखा देती है। किसी को जोकरगिरी स‌िखा देती है। किसी को जमूरा बना देती है। यही हकीकत है। यही स‌र्कस है। (जारी...)

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